Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 42

शक्रादिस्तुति

रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी । तच्छृणुष्व मयाऽऽख्यातं यथावत्कथयामि ते ॥ ४२ ॥

rakṣhaṇāya cha lokānāṁ devānāmupakāriṇī tachchhṛiṇuṣhva mayā’’khyātaṁ yathāvatkathayāmi te

हिंदी अर्थ

लोकों की रक्षा के लिए, देवताओं का उपकार करने वाली: वह मुझसे सुनो; मैं तुम्हें ज्यों-का-त्यों बताता हूँ।"

भावार्थ

मध्यम चरित्र "ह्रीं" बीज के साथ समाप्त होता है, जो महालक्ष्मी से जुड़ा है। पाठ-परंपरा प्रथम, मध्यम और उत्तम चरित्रों को उपासना की एक पूर्ण इकाई मानती है।