सोऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः । ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम् ॥ १८ ॥
so’pi vaiśhyastato jñānaṁ vavre nirviṇṇamānasaḥ mametyahamiti prājñaḥ saṅgavichyutikārakam
हिंदी अर्थ
वैश्य का चित्त संसार से विरक्त हो चुका था, और वे बड़े बुद्धिमान थे; इसलिए उन्होंने ममता और अहंता रूपी आसक्ति का नाश करने वाला ज्ञान माँगा।
भावार्थ
"ममेत्यहमिति", "मेरा" और "मैं": समाधि वह ज्ञान माँगते हैं जो उसी ममता को काटता है जिसने अध्याय 1 में दोनों को सताया था। एक ही समस्या और एक ही गुरु वाले दो व्यक्ति अलग-अलग चुनते हैं, और देवी दोनों को देती हैं। भुक्ति और मुक्ति के भेद पर यही ग्रंथ का उत्तर है।
