अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः । निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ ॥ ११ ॥
arhaṇāṁ chakratustasyāḥ puṣhpadhūpāgnitarpaṇaiḥ nirāhārau yatāhārau tanmanaskau samāhitau
हिंदी अर्थ
पुष्प, धूप, हवन और तर्पण से उनकी आराधना करने लगे। पहले उन्होंने आहार धीरे-धीरे कम किया, फिर बिलकुल निराहार रहकर देवी में ही मन लगाए एकाग्रता से उनका चिन्तन किया।
भावार्थ
"यताहारौ, निराहारौ": पहले सीमित आहार, फिर निराहार। नवरात्रि के व्रत का यही आदर्श है।
