Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 13, श्लोक 11

सुरथवैश्ययोर्वरप्रदान

अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः । निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ ॥ ११ ॥

arhaṇāṁ chakratustasyāḥ puṣhpadhūpāgnitarpaṇaiḥ nirāhārau yatāhārau tanmanaskau samāhitau

हिंदी अर्थ

पुष्प, धूप, हवन और तर्पण से उनकी आराधना करने लगे। पहले उन्होंने आहार धीरे-धीरे कम किया, फिर बिलकुल निराहार रहकर देवी में ही मन लगाए एकाग्रता से उनका चिन्तन किया।

भावार्थ

"यताहारौ, निराहारौ": पहले सीमित आहार, फिर निराहार। नवरात्रि के व्रत का यही आदर्श है।