Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 11, श्लोक 53

देव्याः स्तुति (नारायणी स्तुति)

तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसङ्ख्येयषट्पदम् । त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ॥ ५३ ॥

tadāhaṁ bhrāmaraṁ rūpaṁ kṛitvā’saṅkhyeyaṣhaṭpadam trailokyasya hitārthāya vadhiṣhyāmi mahāsuram

हिंदी अर्थ

तब मैं तीनों लोकों के हित के लिए असंख्य छह पैरों वाले भ्रमरों का रूप धारण करके उस महादैत्य का वध करूँगी।

भावार्थ

एक असामान्य अवतार: एक रूप नहीं, भ्रमरों का एक झुंड।