विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपे ष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या । ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम् ॥ ३१ ॥
vidyāsu śhāstreṣhu vivekadīpe ṣhvādyeṣhu vākyeṣhu cha kā tvadanyā mamatvagarte’timahāndhakāre vibhrāmayatyetadatīva viśhvam
हिंदी अर्थ
विद्याओं में, विवेक का दीपक जलाने वाले शास्त्रों में और आदिवाक्यों (वेदों) में तुम्हारे सिवा और कौन है? और तुम्हारे सिवा कौन इस विश्व को घोर अन्धकार से भरे ममता रूपी गढ़े में निरंतर भटका रही है?
भावार्थ
फिर दोनों पक्ष: वे ज्ञान का प्रकाश भी हैं और "ममत्व" का अंधकार भी, जिसने अध्याय 1 में सुरथ और समाधि को फँसाया था।
