विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ । नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥ ९० ॥
viṣhṇoḥ prabodhanārthāya nihantuṁ madhukaiṭabhau netrāsyanāsikābāhuhṛidayebhyastathorasaḥ
हिंदी अर्थ
विष्णु को जगाने और मधु-कैटभ को मारने के लिए, उनके नेत्र, मुख, नासिका, भुजाओं, हृदय और वक्षःस्थल से निकलकर
भावार्थ
एक सजीव चित्र: निद्रा अंग-अंग से विष्णु के शरीर को छोड़ती है। जो देवी उन्हें धारण किए थीं, वे अब बाहर आ जाती हैं।
