उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते । योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ॥ ६६ ॥
utpanneti tadā loke sā nityāpyabhidhīyate yoganidrāṁ yadā viṣhṇurjagatyekārṇavīkṛite
हिंदी अर्थ
तब नित्य होते हुए भी वे लोक में 'उत्पन्न' कही जाती हैं। जब कल्प के अंत में सारा जगत एक महासागर बन गया था, और भगवान विष्णु
भावार्थ
पहला चरित्र एक ब्रह्मांडीय चक्र के अंत में शुरू होता है, जब सब कुछ एक महासागर ("एकार्णव") में विलीन हो चुका है। यही मधु-कैटभ कथा की पृष्ठभूमि है।
