Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 1, श्लोक 58

मधुकैटभवध

संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥ ५८ ॥

saṁsārabandhahetuśhcha saiva sarveśhvareśhvarī

हिंदी अर्थ

और वही संसार के बंधन की भी हेतु हैं, सब ईश्वरों की भी ईश्वरी।"

भावार्थ

बंधन और मुक्ति, दोनों उन्हीं से आते हैं। इसीलिए आगे का मार्ग अकेले महामाया से लड़ना नहीं, बल्कि उनकी ओर मुड़ना है।