सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये । सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ॥ ५७ ॥
saiṣhā prasannā varadā nṛiṇāṁ bhavati muktaye sā vidyā paramā mukterhetubhūtā sanātanī
हिंदी अर्थ
वही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति का वरदान देती हैं। वही परम विद्या और मुक्ति की सनातन हेतु हैं,
भावार्थ
यह शिक्षा का निर्णायक मोड़ है। देवी केवल बाँधने वाली नहीं; भक्ति से प्रसन्न होकर वही "विद्या" भी हैं, वह ज्ञान जो मुक्त करता है। एक ही माता के हाथ में दोनों कुंजियाँ हैं।
