Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 1, श्लोक 53

मधुकैटभवध

लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि । तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः ॥ ५३ ॥

lobhātpratyupakārāya nanvetān kiṁ na paśhyasi tathāpi mamatāvartte mohagarte nipātitāḥ

हिंदी अर्थ

बदले में उपकार की आशा से, लोभवश; क्या तुम यह नहीं देखते? फिर भी वे ममता के भँवर और मोह के गड्ढे में गिराए जाते हैं,

भावार्थ

संतान के प्रति मनुष्य की आसक्ति में प्रायः बदले की एक छिपी अपेक्षा होती है। फिर भी यह जानते हुए लोग ममता के भँवर में गिर जाते हैं। गीता प्रेस यहाँ "नन्वेते" पाठान्तर बताता है।