जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम । अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥ ४२ ॥
jānato’pi yathājñasya kimetanmunisattama ayaṁ cha nikṛitaḥ putrairdārairbhṛityaistathojjhitaḥ
हिंदी अर्थ
जानते हुए भी मैं अज्ञानी की भाँति दुःखी होता हूँ; हे मुनिश्रेष्ठ! यह क्या है? और यह वैश्य पुत्रों द्वारा अपमानित और पत्नी तथा सेवकों द्वारा त्यागा गया है,
भावार्थ
"जानते हुए भी अज्ञानी की भाँति" ("जानतोऽपि यथाज्ञस्य") प्रश्न का केंद्र है। गीता प्रेस यहाँ "निकृतः" के स्थान पर "निष्कृतः" पाठान्तर बताता है।
