Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 1, श्लोक 24

मधुकैटभवध

प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः । किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ॥ २४ ॥

pravṛittiṁ svajanānāṁ cha dārāṇāṁ chātra saṁsthitaḥ kiṁ nu teṣhāṁ gṛihe kṣhemamakṣhemaṁ kiṁ nu sāmpratam

हिंदी अर्थ

यहाँ रहते हुए मुझे अपने स्वजनों और पत्नी का कोई समाचार नहीं मिलता। इस समय उनके घर में कुशल है या अकुशल?

भावार्थ

जिस बेचैन प्रश्न ने सुरथ के मन को भरा था, वही समाधि के मन को भी भरता है। दोनों के आत्मकथन एक-दूसरे का प्रतिबिंब हैं।