Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 1, श्लोक 103

मधुकैटभवध

तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता । कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥ १०३ ॥

tathetyuktvā bhagavatā śhaṅkhachakragadābhṛitā kṛitvā chakreṇa vai chchhinne jaghane śhirasī tayoḥ

हिंदी अर्थ

"'तथास्तु' कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने उन दोनों के सिर अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट दिए।

भावार्थ

विष्णु की जाँघ सागर के बीच सूखी भूमि है, इसलिए छूट बंद हो जाती है। प्रथम चरित्र इस प्रकार समाप्त होता है कि असुर विष्णु के माध्यम से काम करने वाली देवी की शक्ति से मारे जाते हैं।