Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 6, श्लोक 5

शुम्भनिशुम्भसेनानीधूम्रलोचनवध

तत्परित्राणदः कश्चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः । स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा ॥ ५ ॥

tatparitrāṇadaḥ kaśhchidyadi vottiṣhṭhate’paraḥ sa hantavyo’maro vāpi yakṣho gandharva eva vā

हिंदी अर्थ

यदि उसकी रक्षा के लिए कोई और खड़ा हो, वह देवता, यक्ष या गंधर्व ही क्यों न हो, उसे मार डालना।"

भावार्थ

शुम्भ मानता है कि उन्हें रक्षकों की आवश्यकता है। वह अभी नहीं समझता कि वे ही सबकी रक्षक हैं।