Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 9

शक्रादिस्तुति

या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्व मभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः । मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि ॥ ९ ॥

yā muktiheturavichintyamahāvratā tva mabhyasyase suniyatendriyatattvasāraiḥ mokṣhārthibhirmunibhirastasamastadoṣhai rvidyāsi sā bhagavatī paramā hi devi

हिंदी अर्थ

हे देवि! जो मोक्ष का कारण है, अचिंत्य महाव्रत रूप है, और जिसका अभ्यास इंद्रियों को वश में करने वाले, तत्त्व को सार मानने वाले, सब दोषों से रहित मुमुक्षु मुनि करते हैं, वह परा विद्या भगवती आप ही हैं।

भावार्थ

देवी केवल संसार की शक्ति ही नहीं, "परा विद्या" भी हैं, वह सर्वोच्च ज्ञान जो मुक्त करता है। यह 1.57 की प्रतिध्वनि है: जो बाँधती हैं, वही मुक्त भी करती हैं। गीता प्रेस यहाँ "च अभ्य॰" पाठान्तर बताता है।