Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 13, श्लोक 28

सुरथवैश्ययोर्वरप्रदान

बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता । एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः ॥ २८ ॥

babhūvāntarhitā sadyo bhaktyā tābhyāmabhiṣhṭutā evaṁ devyā varaṁ labdhvā surathaḥ kṣhatriyarṣhabhaḥ

हिंदी अर्थ

और उनके द्वारा भक्तिपूर्वक अपनी स्तुति सुनकर देवी तत्काल अन्तर्धान हो गईं। इस प्रकार देवी से वर पाकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ,

भावार्थ

देवी वैसे ही अन्तर्धान होती हैं जैसे देवताओं के सामने हुई थीं (4.39, 12.33)।