Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 13, श्लोक 27

सुरथवैश्ययोर्वरप्रदान

इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम् ॥ २७ ॥

iti dattvā tayordevī yathābhilaṣhitaṁ varam

हिंदी अर्थ

इस प्रकार उन दोनों को मनोवांछित वरदान देकर,

भावार्थ

मार्कण्डेय समापन करते हैं। श्लोक 27–29 पूरे ग्रंथ का समापन हैं।