रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ २९ ॥
rogānaśheṣhānapahaṁsi tuṣhṭā ruṣhṭā tu kāmān sakalānabhīṣhṭān tvāmāśhritānāṁ na vipannarāṇāṁ tvāmāśhritā hyāśhrayatāṁ prayānti
हिंदी अर्थ
तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और रुष्ट होने पर सब मनोवांछित कामनाओं का नाश कर देती हो। जो तुम्हारी शरण में हैं, उन पर विपत्ति नहीं आती; तुम्हारी शरण में गए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले बन जाते हैं।
भावार्थ
"रोगानशेषानपहंसि तुष्टा": रोग-निवारण के लिए व्यापक रूप से पढ़ा जाता है। अंतिम पंक्ति ध्यान खींचती है: जो उनकी शरण में जाते हैं, वे स्वयं दूसरों की शरण बन जाते हैं। गीता प्रेस यहाँ "ददासि कामान्" (कामनाएँ देती हो) पाठान्तर बताता है, जो दूसरी पंक्ति का अर्थ बदल देता है।
