Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 10, श्लोक 5

शुम्भवध

एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा । पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥ ५ ॥

ekaivāhaṁ jagatyatra dvitīyā kā mamāparā paśhyaitā duṣhṭa mayyeva viśhantyo madvibhūtayaḥ

हिंदी अर्थ

"इस संसार में मैं अकेली ही हूँ; मेरे सिवा दूसरी कौन है? देख दुष्ट! ये मेरी ही विभूतियाँ हैं, जो मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं।"

भावार्थ

"एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा" (इस संसार में मैं अकेली हूँ; मेरे सिवा दूसरी कौन है?) युद्ध-कथा का दार्शनिक शिखर है। सब देवियाँ (काली, मातृकाएँ, शिवदूती) कभी अलग प्राणी नहीं थीं, बल्कि देवी की अपनी विभूतियाँ थीं, जो उपनिषदों के "एकमेवाद्वितीयम्" (एक ही, दूसरा नहीं) विचार की प्रतिध्वनि है। गीता प्रेस बताता है कि कुछ प्रतियों में इस श्लोक के बाद "ऋषिरुवाच" जुड़ा है।