Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 10, श्लोक 32

शुम्भवध

जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः ॥ ३२ ॥

jajvaluśhchāgnayaḥ śhāntāḥ śhāntā digjanitasvanāḥ

हिंदी अर्थ

बुझी हुई यज्ञ-अग्नियाँ फिर प्रज्वलित हो उठीं, और दिशाओं के भयंकर शब्द शांत हो गए।

भावार्थ

यज्ञ-अग्नियाँ अपने आप फिर जल उठती हैं: असुरों द्वारा बाधित उपासना फिर शुरू होती है। अध्याय शांति में समाप्त होता है।