जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः ॥ ३२ ॥
jajvaluśhchāgnayaḥ śhāntāḥ śhāntā digjanitasvanāḥ
हिंदी अर्थ
बुझी हुई यज्ञ-अग्नियाँ फिर प्रज्वलित हो उठीं, और दिशाओं के भयंकर शब्द शांत हो गए।
भावार्थ
यज्ञ-अग्नियाँ अपने आप फिर जल उठती हैं: असुरों द्वारा बाधित उपासना फिर शुरू होती है। अध्याय शांति में समाप्त होता है।
