एक नज़र में
- नाम और अर्थ: याज्ञवल्क्य — “यज्ञ” पर आधारित नाम, जो यजुर्वेद के याज्ञिक-ऋषि के लिए उपयुक्त है।
- अन्य नाम: वाजसनेय (वाजसनेयी संहिता से); योगीश्वर — याज्ञवल्क्य स्मृति अपने पहले ही श्लोक में उन्हें यही कहती है।
- श्रेणी: महर्षि; उपनिषद के आचार्य; शुक्ल यजुर्वेद के द्रष्टा।
- पिता: विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मरात; भागवत पुराण (12.6) के अनुसार देवरात। कुछ क्षेत्रीय परंपराएँ माता-पिता का नाम ब्रह्मरात और सुनंदा बताती हैं।
- माता: कुछ परंपराओं में सुनंदा; प्राचीन ग्रंथ उनका नाम नहीं देते।
- पत्नियाँ: मैत्रेयी और कात्यायनी (बृहदारण्यक उपनिषद)।
- गुरु: वैशंपायन (पौराणिक परंपरा में उनके मामा) और उद्दालक आरुणि; अंततः सूर्यदेव, जिनसे उन्हें शुक्ल यजुर्वेद मिला।
- शिष्य: उपनिषद उनके शिष्य सामश्रवा का नाम लेता है; शुक्ल यजुर्वेद की काण्व और माध्यंदिन शाखाएँ परंपरा से उनके शिष्यों से जुड़ी हैं।
- काल: बृहदारण्यक उपनिषद को सामान्यतः ईसा पूर्व सातवीं-छठी शताब्दी का माना जाता है, जिससे उपनिषद के याज्ञवल्क्य उत्तर-वैदिक काल में आते हैं।
- संबंधित स्थान: मिथिला (विदेह), राजा जनक का दरबार; मिथिला उन्हें अपना ऋषि मानती है।
- प्रमुख रचनाएँ (परंपरा से): शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता) और शतपथ ब्राह्मण; बृहदारण्यक उपनिषद में उनके उपदेश; याज्ञवल्क्य स्मृति और योग याज्ञवल्क्य उनके नाम से।
- किस लिए प्रसिद्ध: जनक की सभा का शास्त्रार्थ, मैत्रेयी संवाद, और आत्मा का “नेति, नेति” — यह नहीं, यह नहीं — के रूप में उपदेश।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
उपनिषदों की रुचि इसमें है कि याज्ञवल्क्य ने क्या कहा, उनकी वंशावली में नहीं। इसलिए उनके परिवार की जानकारी बाद के ग्रंथों से आती है — और वह अलग-अलग है। विष्णु पुराण उन्हें ब्रह्मरात का पुत्र कहता है, भागवत पुराण देवरात का। कुछ परंपराएँ, विशेषकर मिथिला में, उनके माता-पिता को ब्रह्मरात और सुनंदा के रूप में याद करती हैं और उनका जन्म वहीं मानती हैं। स्कंद पुराण की एक परंपरा तो उन्हें ब्रह्मा का अंशावतार भी बताती है। इन्हें परस्पर विरोध नहीं, समानांतर पारिवारिक स्मृतियाँ मानना ठीक है।
उनके गृहस्थ जीवन के बारे में बृहदारण्यक उपनिषद स्पष्ट है: उनकी दो पत्नियाँ थीं। कात्यायनी के बारे में वह कहता है कि उनमें सामान्य स्त्री-बुद्धि थी; मैत्रेयी “ब्रह्मवादिनी” थीं — ब्रह्म पर चर्चा करने वाली। दोनों पति-पत्नी का संवाद उपनिषदों के सबसे प्रिय अंशों में से एक बना।
जीवन और प्रमुख प्रसंग
वेद लौटाना — और सूर्य से नया वेद पाना
विष्णु पुराण (3.5) और भागवत (12.6) वह कथा सुनाते हैं जो यजुर्वेद की दो धाराओं का कारण बताती है। याज्ञवल्क्य वैशंपायन के मेधावी शिष्य थे — वही वैशंपायन, जिन्हें वेदव्यास ने यजुर्वेद सौंपा था। जब वैशंपायन से अनजाने में अपनी बहन के पुत्र की हत्या का पाप हो गया, तो उन्होंने शिष्यों से अपने लिए प्रायश्चित्त करने को कहा। याज्ञवल्क्य बोले कि बाकी शिष्य दुर्बल हैं, मैं अकेला ही कर दूँगा। इस अहंकार से क्रुद्ध गुरु ने आदेश दिया कि मुझसे जो कुछ सीखा है, लौटा दो। याज्ञवल्क्य ने यजुर्वेद के मंत्र वमन कर दिए, और दूसरे शिष्यों ने तीतर (तित्तिरि) बनकर उन्हें चुग लिया — इसी से वह शाखा तैत्तिरीय (कृष्ण यजुर्वेद) कहलाई।
वेद-विहीन याज्ञवल्क्य ने सूर्य की उपासना की। सूर्यदेव अश्व (वाजी) रूप में प्रकट हुए और उन्हें ऐसे नए यजुः-मंत्र सिखाए जो उनके गुरु को भी ज्ञात न थे। यही शुक्ल यजुर्वेद बना, जिसे वाजसनेयी संहिता भी कहते हैं। इसी कारण याज्ञवल्क्य सूर्योपासना से विशेष रूप से जुड़े हैं; देखें आदित्य हृदय स्तोत्र।
जनक की सभा का महान शास्त्रार्थ
बृहदारण्यक उपनिषद का तीसरा अध्याय भारतीय दर्शन के सबसे प्रसिद्ध शास्त्रार्थ का वर्णन करता है। विदेह के राजा जनक ने बहुत दक्षिणा वाला यज्ञ किया और सबसे बड़े ब्रह्मज्ञानी के लिए ऐसी एक हज़ार गायें रखीं जिनके सींगों पर सोना बँधा था। सब झिझक रहे थे, तभी याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्य सामश्रवा से कहा — इन्हें हाँक ले चलो। क्रुद्ध विद्वानों ने एक-एक कर उन्हें चुनौती दी — राजपुरोहित अश्वल, आर्तभाग, भुज्यु, उषस्त, कहोल, उद्दालक आरुणि, विदग्ध शाकल्य — और उन्होंने सबको उत्तर दिया। देवता कितने हैं, यह पूछे जाने पर वे संख्या घटाते-घटाते एक तक पहुँचते हैं। विदुषी गार्गी वाचक्नवी दो बार प्रश्न करती हैं और पूछती हैं कि आख़िर सब कुछ किसमें “ओत-प्रोत” है; वे अक्षर (अविनाशी) का उपदेश देते हैं, और गार्गी सभा से कहती हैं कि इन्हें कोई नहीं हरा सकेगा। प्राचीन साहित्य में यह दुर्लभ दृश्य है — एक स्त्री सार्वजनिक दार्शनिक प्रतियोगिता का निर्णय सुना रही है।
मैत्रेयी और आत्मा
जब याज्ञवल्क्य गृहस्थ जीवन छोड़ने का निश्चय करते हैं, तो संपत्ति दोनों पत्नियों में बाँटने की बात कहते हैं (बृहदारण्यक 2.4, और फिर 4.5)। मैत्रेयी पूछती हैं — यदि धन से भरी पूरी पृथ्वी मेरी हो जाए, तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी? नहीं, वे कहते हैं — तुम्हारा जीवन धनवानों जैसा होगा, पर धन से अमरता की कोई आशा नहीं। मैत्रेयी का उत्तर अमर हो गया: “जिससे मैं अमर न होऊँ, उसे लेकर मैं क्या करूँ?” तब वे समझाते हैं कि पति, पत्नी, संतान या धन अपने लिए नहीं, आत्मा के लिए प्रिय होते हैं, और वही आत्मा देखने, सुनने, मनन करने और ध्यान करने योग्य है।
राजा जनक को उपदेश
बृहदारण्यक 4.3 में जनक पूछते हैं कि मनुष्य किस ज्योति से जीता है। याज्ञवल्क्य कहते हैं — सूर्य से; सूर्य अस्त हो तो चंद्रमा से; फिर अग्नि से; फिर वाणी से; और जब ये सब न रहें — तब आत्मा ही उसकी ज्योति है। आगे यह संवाद जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मृत्यु और मोक्ष की पड़ताल करता है, और उपनिषदों के सबसे समृद्ध अंशों में गिना जाता है।
उपलब्धियाँ और योगदान
- “नेति, नेति”। निषेध द्वारा आत्मा का वर्णन — यह नहीं, यह नहीं; वह पकड़ में नहीं आता, नष्ट नहीं होता, कहीं चिपकता नहीं — यह पद्धति अद्वैत वेदांत की आधारशिला बनी।
- कर्म और पुनर्जन्म का आरंभिक उपदेश। मनुष्य जैसा करता है वैसा बनता है, और मृत्यु पर आगे बढ़ता है — इसके कुछ सबसे पुराने स्पष्ट कथन उन्हीं के मुख से हैं।
- एक वैदिक शाखा के प्रवर्तक। शुक्ल यजुर्वेद की परंपरा — जो आज भी माध्यंदिन और काण्व शाखाओं में पढ़ी जाती है — उन्हें अपना द्रष्टा मानती है।
- संन्यास का आदर्श। मैत्रेयी को उपदेश देकर उनका गृहत्याग संन्यास-परंपरा के लिए आदर्श बना।
याज्ञवल्क्य के नाम से जुड़ी रचनाएँ
शुक्ल यजुर्वेद और शतपथ ब्राह्मण। परंपरा उन्हें वाजसनेयी संहिता का द्रष्टा और शतपथ ब्राह्मण का केंद्रीय आचार्य मानती है, जहाँ उनके वचन बार-बार उद्धृत हैं।
बृहदारण्यक उपनिषद। शतपथ ब्राह्मण के अंतिम भाग, इस उपनिषद का बड़ा हिस्सा उनके उपदेशों का है।
याज्ञवल्क्य स्मृति। लगभग 1,010 श्लोकों का धर्मशास्त्र, तीन कांडों में — आचार, व्यवहार (न्याय-प्रक्रिया) और प्रायश्चित्त। इसे मिथिला के ऋषियों को याज्ञवल्क्य के उपदेश के रूप में प्रस्तुत किया गया है, पर विद्वान इसे लगभग तीसरी से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी का मानते हैं — उपनिषद के ऋषि से कई शताब्दियों बाद — और नाम को श्रद्धावश जोड़ा गया मानते हैं। विज्ञानेश्वर की बारहवीं शताब्दी की टीका मिताक्षरा के माध्यम से इसने आधुनिक काल तक हिंदू उत्तराधिकार कानून को आकार दिया।
योग याज्ञवल्क्य। उनके नाम से योग पर एक ग्रंथ; विद्वान इसके लेखक को वैदिक ऋषि नहीं, बहुत बाद का कोई याज्ञवल्क्य मानते हैं।
आज वे क्यों पूजनीय हैं
- याज्ञवल्क्य जयंती उत्तर भारत में बहुत से लोग फाल्गुन शुक्ल पंचमी को मनाते हैं; अन्य क्षेत्रों में फाल्गुन कृष्ण पंचमी और कार्तिक मास की तिथियाँ भी मानी जाती हैं।
- मिथिला (उत्तर बिहार) उन्हें अपने महान ऋषि के रूप में याद करती है, और हिंदू विधि की मिथिला-परंपरा स्वयं को उनकी स्मृति से जोड़ती है।
- शुक्ल यजुर्वेदी ब्राह्मण वाजसनेयी संहिता को उन्हीं का वेद मानकर पढ़ते हैं; गायत्री मंत्र ऋग्वेद के साथ यजुर्वेद में भी मिलता है।
- वेदांत के विद्यार्थी उनसे प्रधान उपनिषदों में सबसे विशाल, बृहदारण्यक, में मिलते हैं।
भिन्न परंपराएँ और ऐतिहासिक टिप्पणी
कई ऋषियों की तरह “याज्ञवल्क्य” नाम भी संभवतः एक से अधिक व्यक्तियों का है: उपनिषद के दार्शनिक, स्मृति के कथित लेखक और योग-ग्रंथ के लेखक को विद्वान सामान्यतः अलग-अलग व्यक्ति मानते हैं। बृहदारण्यक स्वयं काण्व और माध्यंदिन, दो पाठों में मिलता है, जिनके शब्दों में अंतर है। महाभारत मैत्रेयी को उपनिषद से अलग ढंग से दिखाता है — एक विदुषी जो विवाह नहीं करतीं। तीतर वाली कथा वेद-शाखाओं की पौराणिक व्याख्या है, ऐतिहासिक विवरण नहीं। कुछ स्रोत उद्दालक आरुणि को उनका गुरु बताते हैं, जबकि जनक के शास्त्रार्थ में दोनों प्रतिद्वंद्वी के रूप में आते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
“नेति, नेति” का क्या अर्थ है?
“यह नहीं, यह नहीं।” याज्ञवल्क्य इससे बताते हैं कि आत्मा को किसी वस्तु के रूप में नहीं कहा जा सकता — जिस किसी की ओर संकेत करो, वह वह नहीं है।
याज्ञवल्क्य की पत्नियाँ कौन थीं?
बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार मैत्रेयी और कात्यायनी। मैत्रेयी स्वयं एक दार्शनिक के रूप में याद की जाती हैं।
क्या याज्ञवल्क्य स्मृति याज्ञवल्क्य ने लिखी?
परंपरा ऐसा मानती है; विद्वान इसे लगभग तीसरी-पाँचवीं शताब्दी ईस्वी का मानते हैं और नाम को प्राचीन ऋषि के प्रति सम्मानसूचक मानते हैं।
