Bhakti Arohan
ॐ

महर्षि पराशर

वसिष्ठ के पौत्र और वेदव्यास के पिता पराशर विष्णु पुराण के वक्ता, ऋग्वेद के नौ अग्नि-सूक्तों के द्रष्टा, और पराशर स्मृति के नामधारी हैं, जो स्वयं को कलियुग का धर्मशास्त्र कहती है।

एक नज़र में

  • नाम और अर्थ: पराशर। महाभारत इस नाम का अर्थ “मरने को उद्यत व्यक्ति को लौटा लाने वाला” बताता है, क्योंकि उनके जन्म ने उनके दादा वसिष्ठ को आत्मघात से रोका था।
  • अन्य नाम: शाक्त्य या शाक्तेय (“शक्ति के पुत्र”), वैदिक द्रष्टा के रूप में उनका पितृनाम।
  • श्रेणी: महर्षि; वैदिक द्रष्टा, पौराणिक वक्ता और धर्मशास्त्रकार।
  • पिता: वसिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र ऋषि शक्ति (शक्त्रि)।
  • माता: अदृश्यन्ती।
  • संतान: सत्यवती से उत्पन्न कृष्ण द्वैपायन व्यास।
  • शिष्य: मैत्रेय, जिन्हें वे विष्णु पुराण सुनाते हैं।
  • वंश: वसिष्ठ → शक्ति → पराशर → व्यास। पराशर अपने आप में एक गोत्र भी हैं।
  • काल: ऋग्वेद के प्रथम मंडल में द्रष्टा के रूप में नाम आता है, और महाभारत युद्ध से पहले की पीढ़ी में रखे जाते हैं। कोई ऐतिहासिक तिथि संभव नहीं।
  • प्रमुख ग्रंथ: ऋग्वेद 1.65–73 (अग्नि-सूक्त); विष्णु पुराण (वक्ता के रूप में); पराशर स्मृति। ज्योतिष और कृषि के ग्रंथ भी उनके नाम से जुड़े हैं।
  • प्रसिद्धि का कारण: यमुना के द्वीप पर व्यास का जन्म, और पिता की हत्या करने वाले राक्षसों को क्षमा करना।

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

पराशर की कथा एक मृत्यु से शुरू होती है। महाभारत (आदि पर्व, चैत्ररथ उपपर्व) के अनुसार उनके पिता शक्ति का राजा कल्माषपाद से वन के एक संकरे मार्ग पर विवाद हुआ, और शक्ति ने राजा को राक्षस बनने का शाप दे दिया। वसिष्ठ के बड़े प्रतिद्वंद्वी विश्वामित्र ने अवसर देखा और किंकर नाम के एक राक्षस को राजा के शरीर में प्रवेश करा दिया। राक्षस से ग्रस्त राजा ने शक्ति को खा लिया, और फिर वसिष्ठ के दूसरे पुत्रों को भी।

शोक से व्याकुल वसिष्ठ ने बार-बार प्राण त्यागने का प्रयास किया। वे पर्वत से कूदे, अग्नि में और नदियों में गिरे, पर हर बार बच गए। जब वे आश्रम लौट रहे थे, तब उन्होंने पीछे से किसी को शक्ति जैसे स्वर में, उच्चारण के सारे गुणों के साथ, वेदपाठ करते सुना। यह उनकी विधवा पुत्रवधू अदृश्यन्ती थीं। उन्होंने बताया कि यह स्वर उनके गर्भ में पल रहे शक्ति के पुत्र का है, जो बारह वर्षों से वहाँ वेदपाठ कर रहा है। वसिष्ठ ने मरने का विचार छोड़ दिया। बालक का जन्म हुआ तो उसका नाम इसी कारण पराशर रखा गया: उसने दादा को मृत्यु से लौटा लिया था।

जीवन और प्रमुख प्रसंग

“ये तुम्हारे पिता नहीं हैं”

पराशर बचपन में वसिष्ठ को “पिता” कहकर बुलाते थे। एक दिन यह सुनकर उनकी माता ने आँसुओं के साथ बताया कि ये तुम्हारे दादा हैं, और तुम्हारे पिता को वन में एक राक्षस खा गया। बालक का शोक क्रोध में बदल गया, और उन्होंने पूरी सृष्टि के विनाश का संकल्प कर लिया। वसिष्ठ ने उन्हें भृगुवंशी ऋषि और्व की कथा सुनाकर शांत किया, जिनका क्रोध कभी लोकों के लिए संकट बन गया था और जिन्होंने उसे समुद्र में डाल दिया था।

राक्षस-सत्र और पुलस्त्य का वरदान

पराशर ने लोकों के विनाश का विचार तो छोड़ दिया, पर सभी राक्षसों, बूढ़ों और बच्चों तक, को जलाने के लिए एक महायज्ञ आरंभ कर दिया। महाभारत में वसिष्ठ उन्हें नहीं रोकते। इसके बजाय अत्रि, पुलह, क्रतु और विशेषकर राक्षसों के पूर्वज पुलस्त्य उनसे अनुरोध करने आते हैं। पुलस्त्य कहते हैं कि जिन राक्षसों को तुम जला रहे हो, उन्हें तुम्हारे पिता की मृत्यु का कुछ पता भी नहीं, और तपस्वी के लिए शांति ही परम धर्म है। पराशर यज्ञ समाप्त करते हैं और उसकी अग्नि हिमालय के उत्तर के वनों में डाल देते हैं।

विष्णु पुराण (1.1) यही प्रसंग स्वयं पराशर के मुख से कहता है, एक अंतर के साथ: यहाँ वसिष्ठ उनसे कहते हैं कि “साधु क्षमाशील होते हैं” और यज्ञ रोकने को कहते हैं। फिर पुलस्त्य प्रकट होते हैं और इस बात से प्रसन्न होकर कि पराशर ने उनके वंशजों को छोड़ दिया, उन्हें वरदान देते हैं: तुम पुराण-संहिता के रचयिता बनोगे और देवताओं का यथार्थ ज्ञान पाओगे। इसी वरदान के कारण, जब शिष्य मैत्रेय पूछते हैं कि संसार कैसे बना, तो पराशर विष्णु पुराण सुना पाते हैं।

सत्यवती और यमुना का द्वीप

उनके जीवन का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग आदि पर्व के 63वें अध्याय में है। एक निषादराज की पालित पुत्री सत्यवती यमुना में नाव चलाकर लोगों को पार कराती थीं। मछुआरों के बीच पलने के कारण उनके शरीर से मछली की गंध आती थी। यात्रा पर निकले पराशर ने उन्हें देखा और उन पर मोहित हो गए। सत्यवती ने आपत्ति की कि दोनों तटों पर खड़े ऋषि देख लेंगे, तो पराशर ने पूरी नदी को ढक लेने वाला कोहरा उत्पन्न कर दिया। फिर सत्यवती ने कहा कि वे पिता के अधीन एक कुमारी हैं। पराशर ने वचन दिया कि उनका कौमार्य बना रहेगा, और उनका माँगा हुआ वरदान दिया: उनके शरीर से मछली की गंध के बजाय सुगंध आए। तब से वे गंधवती कहलाईं, और योजनगंधा भी, क्योंकि उनकी सुगंध एक योजन तक जाती थी।

उसी दिन यमुना के एक द्वीप पर उन्होंने पुत्र को जन्म दिया। द्वीप पर जन्म लेने और श्याम वर्ण होने के कारण वह कृष्ण द्वैपायन कहलाया, वही ऋषि जिन्हें संसार वेदव्यास के नाम से जानता है। बालक तुरंत तप करने चला गया, यह वचन देकर कि माता जब भी याद करेंगी, वह आ जाएगा। सत्यवती का बाद में राजा शांतनु से विवाह हुआ, और दशकों बाद उन्हीं के बुलाने पर व्यास कुरुवंश को आगे बढ़ाने लौटे।

उपलब्धियाँ और योगदान

  • वैदिक द्रष्टा: ऋग्वेद के प्रथम मंडल के सूक्त 65 से 73, जो सब अग्नि को समर्पित हैं, पराशर शाक्त्य के माने जाते हैं। ये अपनी उपमाओं के लिए प्रसिद्ध हैं; एक में अग्नि जल के बीच हंस की तरह साँस लेते हुए बैठे हैं।
  • विष्णु पुराण के वक्ता: पूरा विष्णु पुराण मैत्रेय को दिए पराशर के उत्तर के रूप में है। यह सबसे प्राचीन और व्यवस्थित पुराणों में से है, और ध्रुव, प्रह्लाद और इंद्र को दुर्वासा के शाप जैसी कई कथाओं का स्रोत है जो आज हर जगह सुनाई जाती हैं।
  • कलियुग के धर्मशास्त्रकार: पराशर स्मृति वर्तमान युग के लिए धर्म के नियम देती है, और यह बात वह स्वयं कहती है।
  • व्यास के पिता: व्यास के माध्यम से पराशर उस परंपरा के शीर्ष पर हैं जिससे चार भागों में वेद, महाभारत, पुराण और स्वयं कुरुवंश आगे बढ़े।

उनसे जुड़े ग्रंथ

पराशर स्मृति इस प्रसंग से शुरू होती है कि ऋषि व्यास के माध्यम से पराशर से अपने युग के योग्य धर्म पूछते हैं। इसका सबसे प्रसिद्ध श्लोक हर युग के लिए एक धर्मशास्त्र बताता है:

कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः ।
द्वापरे शाङ्खलिखिताः कलौ पाराशराः स्मृताः ॥ (1.24)

“सत्ययुग में मनु के धर्म, त्रेता में गौतम के, द्वापर में शंख-लिखित के, और कलियुग में पराशर के धर्म मान्य हैं।” इससे ठीक पहले का श्लोक कहता है कि कलियुग में मुख्य धर्म दान है। यह ग्रंथ अपेक्षाकृत छोटा और व्यावहारिक है, और प्रायश्चित्त के विषय में पुराने धर्मशास्त्रों से सामान्यतः नरम है।

बहुत से ज्योतिषियों के लिए वैदिक ज्योतिष का आधार-ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र उन्हीं का माना जाता है, और खेती व मौसम पर कृषि पराशर तथा वनस्पतियों पर एक वृक्षायुर्वेद भी। ये परंपरागत मान्यताएँ हैं। आज उपलब्ध रूप में ये ग्रंथ बहुत बाद में संकलित हुए, और विद्वान इनमें पराशर के नाम को सम्मानसूचक मानते हैं, रचयिता का प्रमाण नहीं।

आज वे क्यों पूजनीय हैं

  • विष्णु पुराण का हर पाठ मैत्रेय से कहे उनके शब्दों से ही आरंभ होता है।
  • वैदिक परंपरा के ज्योतिषी अपनी पद्धति को पाराशरी ज्योतिष कहते हैं और अध्ययन के आरंभ में उनका स्मरण करते हैं।
  • पराशर गोत्र के परिवार संकल्प में उनका नाम लेते हैं। वसिष्ठ की परंपरा में वे वसिष्ठ और व्यास के बीच की कड़ी हैं।
  • हिमाचल प्रदेश (मंडी ज़िले) की पराशर झील और उसका पैगोडा शैली का मंदिर उनकी तपोभूमि माने जाते हैं।

कथाओं के भेद और ऐतिहासिक टिप्पणी

उनके प्रारंभिक जीवन के दो मुख्य वर्णन इस पर भिन्न हैं कि राक्षस-सत्र किसने रुकवाया। महाभारत यह भूमिका पुलस्त्य और अन्य ऋषियों को देता है, जबकि विष्णु पुराण में यह वसिष्ठ करते हैं और उसके बाद पुलस्त्य वरदान देते हैं। सत्यवती का प्रसंग सब जगह एक जैसा है, पर पुनर्कथनों में उसका स्वर बदलता है। कुछ बाद की रचनाएँ उसे नरम करती हैं, और कुछ भक्ति-कथाएँ उसे व्यास के जन्म के लिए दैवी विधान बताती हैं। पराशर का नाम बहुत अलग-अलग कालों के ज्योतिष, धर्मशास्त्र और कृषि के ग्रंथों से भी जुड़ा है। इससे लगता है कि यह एक व्यक्ति से अधिक उनके नाम से चली एक परंपरा है। ऋग्वेद के द्रष्टा, पुराण के वक्ता और व्यास के पिता को परंपरा एक ही व्यक्ति मानती है, और ग्रंथ इनमें कोई भेद नहीं करते।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पराशर के माता-पिता कौन थे?

उनके पिता वसिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र ऋषि शक्ति थे, और माता अदृश्यन्ती। उनका जन्म पिता की मृत्यु के बाद हुआ।

पराशर और वेदव्यास का क्या संबंध है?

पराशर व्यास के पिता हैं। व्यास का जन्म सत्यवती से यमुना के एक द्वीप पर हुआ, इसीलिए वे द्वैपायन, यानी द्वीप पर जन्मे, कहलाते हैं।

“कलौ पाराशराः स्मृताः” का क्या अर्थ है?

यह पराशर स्मृति (1.24) के एक श्लोक का अंतिम चरण है, जिसका अर्थ है कि कलियुग में पराशर के बताए धर्म का पालन करना चाहिए।

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