मुंडन क्या है और क्यों किया जाता है
चूड़ाकर्म ("चोटी बनाना") सोलह संस्कारों में आठवाँ है। इसमें शिशु के जन्म के बाल उतारे जाते हैं, और परंपरा से सिर के शीर्ष पर एक छोटी लट — शिखा या चोटी — छोड़ी जाती है। इसके पीछे विचार है एक स्वच्छ आरंभ का: गर्भ में उगे बालों को जन्म के अवशेष से जुड़ा माना जाता है, और उन्हें उतारना जीवन के एक नए चरण में प्रवेश का चिह्न है। बहुत-से माता-पिता इसे और भी सरल शब्दों में कहते हैं — यही वह क्षण है जब उनका बच्चा नवजात नहीं रहता।
कौन-सा वर्ष
मनुस्मृति (2.35) कहती है कि चूड़ाकर्म पहले या तीसरे वर्ष में किया जाए। पारिवारिक परंपरा ने इसे सामान्यतः विषम वर्षों तक बढ़ा दिया है — आयु का पहला, तीसरा, पाँचवाँ या सातवाँ वर्ष — और सम वर्ष प्रायः टाले जाते हैं। कुछ समाज पहले वर्ष के अंत में करते हैं, कुछ तीसरे वर्ष तक प्रतीक्षा करते हैं ताकि बच्चा अधिक सबल हो; दोनों ही उचित हैं।
दिन का चुनाव
- काल: उत्तरायण (मकर संक्रांति से सूर्य का उत्तर की ओर चलने वाला अर्धवर्ष) सामान्यतः श्रेष्ठ माना जाता है। खरमास और चातुर्मास टाले जाते हैं।
- नक्षत्र: मृदु, क्षिप्र और चर नक्षत्र — अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और रेवती अधिकांश सूचियों में मिलते हैं।
- तिथि: रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी), अष्टमी और अमावस्या टालें।
- वार: सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार प्रचलित हैं।
- अन्य सावधानियाँ: बहुत-से परिवार तब मुंडन नहीं करते जब बच्चे की माँ फिर से गर्भवती हो, विशेषकर पाँचवें महीने के बाद — यह शास्त्र का नियम कम और कुल-परंपरा अधिक है, पर बहुत व्यापक रूप से माना जाता है।
मुंडन कहाँ होता है
मुंडन उन संस्कारों में है जिन्हें सबसे अधिक तीर्थ या कुलदेवता के मंदिर में किया जाता है। तिरुमला में लाखों परिवार केश अर्पित करते हैं, और हरिद्वार व प्रयागराज के गंगा घाटों, विंध्याचल तथा असंख्य कुलदेवी मंदिरों में मुंडन के लिए अलग स्थान होते हैं। कुछ परिवार घर पर मुंडन करके बाद में बाल नदी में प्रवाहित करते हैं।
संस्कार की विधि
- गणेश पूजन और छोटा हवन, प्रायः कुलदेवता की प्रार्थना के साथ।
- शिशु माँ की गोद में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठता है।
- पुरोहित या पिता पहली प्रतीकात्मक कटाई करते हैं — कई परिवारों में कुछ बालों को कुश से बाँधकर — और नाई मुंडन पूरा करता है।
- सिर धोकर उस पर चंदन या हल्दी का लेप लगाया जाता है, जो त्वचा को ठंडक और सुरक्षा देता है।
- बालों को आटे की लोई या कपड़े में इकट्ठा कर मंदिर में अर्पित किया जाता है या बहते जल में प्रवाहित किया जाता है।
माता-पिता के व्यावहारिक प्रश्न
- ऐसा समय चुनें जब बच्चे का पेट भरा हो और वह आराम कर चुका हो; मुंडन में सबसे आम "विघ्न" रोता हुआ बच्चा ही होता है।
- मंदिरों और तीर्थों में नए ब्लेड का आग्रह अवश्य करें।
- उत्तर भारत के बहुत-से परिवारों में लड़कियों का भी मुंडन होता है; कुछ परिवार लड़की के केवल एक लट काटते हैं। अपने कुल की परंपरा का पालन करें।
