अन्नप्राशन किस बात का प्रतीक है
अन्नप्राशन ("अन्न का प्राशन, यानी खिलाना") सोलह संस्कारों में सातवाँ है, और यह पहली बार है जब शिशु को विधिपूर्वक, आशीर्वाद के साथ अन्न दिया जाता है। तब तक बच्चा केवल दूध पर रहता है; यह संस्कार उस भोजन की ओर बढ़ने का चिह्न है जो पूरा परिवार खाता है, और जीवन भर शिशु के स्वास्थ्य और पोषण की प्रार्थना करता है।
सही मास
मनुस्मृति (2.34) अन्नप्राशन को छठे मास में रखती है — चौथे मास में निष्क्रमण, यानी शिशु के पहली बार घर से बाहर निकलने, के बाद। यह आज के बाल-चिकित्सकों की सलाह से भी मेल खाता है: लगभग छह महीने से ठोस आहार। प्रचलित पारिवारिक परंपरा इसे यों परिष्कृत करती है:
- लड़के: सम मास — छठा या आठवाँ।
- लड़कियाँ: विषम मास — पाँचवाँ या सातवाँ।
केरल में इस संस्कार को चोरूणु कहते हैं और यह प्रायः गुरुवायूर मंदिर में होता है; बंगाल में इसे मुखे भात कहा जाता है, जहाँ परंपरा से मामा पहला कौर खिलाते हैं।
दिन का चुनाव
- तिथि: रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी), अष्टमी, द्वादशी और अमावस्या टालें। द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी और त्रयोदशी प्रचलित हैं।
- नक्षत्र: ध्रुव, मृदु, क्षिप्र और चर नक्षत्र — अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और रेवती।
- वार: सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार।
- समय: सुबह का कोई शुभ चौघड़िया, राहु काल से बाहर।
विधि
- शिशु को स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं — कई परिवारों में ननिहाल से आया पहला जोड़ा।
- गणेश पूजन, कुलदेवता की पूजा और प्रायः छोटा हवन।
- खीर — दूध में पके चावल, थोड़ी चीनी या गुड़, कभी-कभी घी और शहद — पहले भगवान को अर्पित की जाती है और फिर पिता, दादा या मामा परंपरा से चाँदी के चम्मच या सोने की अंगूठी से शिशु को खिलाते हैं।
- इसके बाद एक लोकप्रिय रिवाज़: शिशु के सामने एक थाली में वस्तुएँ रखी जाती हैं — पुस्तक, कलम, पैसे, आभूषण, मिट्टी, भोजन — और बच्चा जो पहले उठाए, उसे विनोद में उसकी भावी रुचि का संकेत माना जाता है।
- बड़े आशीर्वाद देते हैं और परिवार साथ भोजन करता है।
एक व्यावहारिक बात
संस्कार का भोजन वही हो जो शिशु के लिए सुरक्षित है: नरम, अच्छी तरह पकी खीर के कुछ दाने; और डॉक्टरों की सलाह के अनुसार एक वर्ष से छोटे बच्चे को शहद न दें। यदि चुने हुए दिन शिशु अस्वस्थ हो, तो बस कोई और शुभ तिथि चुन लें — पंचांग में सदा एक से अधिक विकल्प होते हैं।
