समय के बारे में शास्त्र क्या कहते हैं
नामकरण सोलह पारंपरिक संस्कारों में पाँचवाँ है। मनुस्मृति (2.30) कहती है कि नामकरण जन्म के दसवें या बारहवें दिन, शुभ तिथि, मुहूर्त और नक्षत्र में किया जाए। गृह्यसूत्र भी लगभग यही समय बताते हैं। दसवें दिन का कारण व्यावहारिक भी है और धार्मिक भी: घर में जन्म से जुड़ा सूतक लगभग तभी समाप्त होता है, और माँ व शिशु सबसे नाज़ुक दिन पार कर चुके होते हैं।
व्यवहार में आज बहुत-से परिवार यह संस्कार ग्यारहवें, बारहवें, किसी बाद के सुविधाजनक दिन, या पहले जन्मदिन पर भी करते हैं। परंपरा इसकी अनुमति देती है: दसवाँ या बारहवाँ दिन निकल जाए तो बाद का कोई शुभ पंचांग वाला दिन चुना जाता है।
पहला अक्षर कैसे चुना जाता है
27 नक्षत्रों में से प्रत्येक के चार चरण होते हैं, और हर चरण को एक अक्षर दिया गया है। जन्म के क्षण शिशु का चंद्रमा इन 108 चरणों में से किसी एक में होता है, और उसी चरण का अक्षर नाम के पहले अक्षर के रूप में सुझाया जाता है। उदाहरण के लिए, अश्विनी के चार चरणों के अक्षर हैं चू, चे, चो, ला; रोहिणी के ओ, वा, वी, वू। जिस तालिका में ये सब दिए होते हैं उसे अवकहड़ा चक्र कहते हैं, और हर पंचांग या कुंडली में यह छपा रहता है।
बहुत-से परिवार दो नाम रखते हैं: एक नक्षत्र नाम, जो पूजा, कुंडली और संकल्प में प्रयोग होता है, और एक व्यावहारिक नाम, जिससे बच्चा रोज़ पुकारा जाता है। यह पूरी तरह पारंपरिक है — इसी से किसी बच्चे का संस्कार-नाम "चू" से शुरू होकर भी स्कूल में उसे आरव कहा जा सकता है।
दिन का चुनाव
- तिथि: रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) और अमावस्या टालें।
- नक्षत्र: मृदु, ध्रुव (स्थिर), क्षिप्र और चर नक्षत्र श्रेष्ठ माने जाते हैं — जैसे रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, श्रवण और रेवती। उग्र और तीक्ष्ण नक्षत्र — जैसे भरणी, आर्द्रा और मूल — टाले जाते हैं।
- वार: सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार सामान्यतः श्रेष्ठ हैं।
- टालें: भद्रा, राहु काल और ग्रहण का दिन।
संस्कार कैसे किया जाता है
- घर की सफ़ाई होती है, माँ और शिशु स्नान करते हैं; माँ नए या स्वच्छ वस्त्र पहनती हैं।
- गणेश पूजन और कलश स्थापना से संस्कार आरंभ होता है, फिर कुलदेवता और नवग्रहों की पूजा।
- पिता (या पुरोहित) चुना हुआ नाम पहले शिशु के दाहिने कान में धीरे से बोलते हैं, फिर सबके सामने ऊँचे स्वर में।
- प्रायः काँसे की थाली में चावल भरकर सोने या चाँदी की सलाई से नाम लिखा जाता है।
- बड़े-बुज़ुर्ग शिशु को आशीर्वाद देते हैं, और फिर छोटा हवन और भोज होता है।
परंपरा के अनुसार अच्छा नाम कैसा हो
गृह्यसूत्र और मनुस्मृति ऐसे सुझाव देते हैं जो आश्चर्यजनक रूप से भाषा-विज्ञान से जुड़े हैं: नाम बोलने में मधुर हो, कुछ परंपराओं में लड़कों के नाम में अक्षरों की संख्या सम हो, और कठोर या डरावने अर्थ वाले नाम न रखे जाएँ। आज अधिकांश परिवार किसी देवता, किसी सद्गुण या प्रकृति की किसी सुंदरता पर नाम रखते हैं — आदित्य, श्रेया, गंगा — जो इस नियम की भावना के अनुरूप ही है।
लचीलेपन पर एक बात
यदि नक्षत्र का अक्षर कोई पसंद का नाम न दे, तो उसे केवल संस्कार-नाम के रूप में रखना सामान्य बात है। और जिस बच्चे का नामकरण किसी कम आदर्श दिन हुआ, उसकी कोई हानि नहीं हुई; यह संस्कार शिशु का परिवार और समाज में औपचारिक स्वागत है, जो पंचांग कुछ भी कहे, होता ही है।
