Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 1, श्लोक 95

मधुकैटभवध

उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम् ॥ ९५ ॥

uktavantau varo’smatto vriyatāmiti keśhavam

हिंदी अर्थ

केशव से बोले, "हमसे कोई वर माँगो।"

भावार्थ

अभिमान से मोहित होकर असुर भगवान को वर देने की पेशकश करते हैं। यह अहंकार का सटीक चित्र है: वे सोचते हैं कि देने की स्थिति में वे हैं।