Bhakti Arohan
ॐ

श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्रम्

वृंदावन में राधा की सबसे प्रिय संस्कृत स्तुति, जिसे शिव द्वारा पार्वती को सुनाया गया माना जाता है। ग्यारह श्लोक एक ही तड़प भरे प्रश्न पर समाप्त होते हैं, "कब मुझे अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाओगी?", और फिर फलश्रुति बताती है कि इसे कब और कहाँ पढ़ें।

श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्रम्

मूल पाठ

मुनीन्द्र–वृन्द–वन्दिते त्रिलोक–शोक–हारिणि प्रसन्न-वक्त्र-पङ्कजे निकुञ्ज-भू-विलासिनि । व्रजेन्द्र–भानु–नन्दिनि व्रजेन्द्र–सूनु–संगते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ १ ॥ अशोक–वृक्ष–वल्लरी वितान–मण्डप–स्थिते प्रवालबाल–पल्लव प्रभारुणांघ्रि–कोमले । वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ २ ॥ अनङ्ग-रङ्ग मङ्गल-प्रसङ्ग-भङ्गुर-भ्रुवां सविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्त–बाणपातनैः । निरन्तरं वशीकृतप्रतीतनन्दनन्दने कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ ३ ॥ तडित्–सुवर्ण–चम्पक–प्रदीप्त–गौर–विग्रहे मुख–प्रभा–परास्त–कोटि–शारदेन्दुमण्डले । विचित्र-चित्र सञ्चरच्चकोर-शाव-लोचने कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ ४ ॥ मदोन्मदाति–यौवने प्रमोद–मान–मण्डिते प्रियानुराग–रञ्जिते कला–विलास–पण्डिते । अनन्यधन्य–कुञ्जराज्य–कामकेलि–कोविदे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ ५ ॥ अशेष–हावभाव–धीरहीरहार–भूषिते प्रभूतशातकुम्भ–कुम्भकुम्भि–कुम्भसुस्तनि । प्रशस्तमन्द–हास्यचूर्ण पूर्णसौख्य–सागरे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ ६ ॥ मृणाल-वाल-वल्लरी तरङ्ग-रङ्ग-दोर्लते लताग्र–लास्य–लोल–नील–लोचनावलोकने । ललल्लुलन्मिलन्मनोज्ञ–मुग्ध–मोहिनाश्रिते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ ७ ॥ सुवर्णमालिकाञ्चित–त्रिरेख–कम्बु–कण्ठगे त्रिसूत्र–मङ्गली-गुण–त्रिरत्न-दीप्ति–दीधिते । सलोल–नीलकुन्तल–प्रसून–गुच्छ–गुम्फिते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ ८ ॥ नितम्ब–बिम्ब–लम्बमान–पुष्पमेखलागुणे प्रशस्तरत्न-किङ्किणी-कलाप-मध्य मञ्जुले । करीन्द्र–शुण्डदण्डिका–वरोहसौभगोरुके कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ ९ ॥ अनेक–मन्त्रनाद–मञ्जु नूपुरारव–स्खलत् समाज–राजहंस–वंश–निक्वणाति–गौरवे । विलोलहेम–वल्लरी–विडम्बिचारु–चङ्क्रमे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ १० ॥ अनन्त–कोटि–विष्णुलोक–नम्र–पद्मजार्चिते हिमाद्रिजा–पुलोमजा–विरिञ्चजा-वरप्रदे । अपार–सिद्धि–ऋद्धि–दिग्ध–सत्पदाङ्गुली-नखे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥ ११ ॥ मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि त्रिवेद–भारतीश्वरि प्रमाण–शासनेश्वरि । रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोद–काननेश्वरि व्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते ॥ १२ ॥ इतीममद्भुतं स्तवं निशम्य भानुनन्दिनी करोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्ष-भाजनम् । भवेत्तदैव सञ्चित त्रिरूप–कर्म नाशनं लभेत्तदा व्रजेन्द्र–सूनु–मण्डल–प्रवेशनम् ॥ १३ ॥ राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधीः । एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः ॥ १४ ॥ यं यं कामयते कामं तं तमाप्नोति साधकः । राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिःस्यात् प्रेमलक्षणा ॥ १५ ॥ ऊरुदघ्ने नाभिदघ्ने हृद्दघ्ने कण्ठदघ्नके । राधाकुण्डजले स्थिता यः पठेत् साधकः शतम् ॥ १६ ॥ तस्य सर्वार्थ सिद्धिः स्याद् वाक्सामर्थ्यं तथा लभेत् । ऐश्वर्यं च लभेत् साक्षाद्दृशा पश्यति राधिकाम् ॥ १७ ॥ तेन स तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम् । येन पश्यति नेत्राभ्यां तत् प्रियं श्यामसुन्दरम् ॥ १८ ॥ नित्यलीला–प्रवेशं च ददाति श्री-व्रजाधिपः । अतः परतरं प्रार्थ्यं वैष्णवस्य न विद्यते ॥ १९ ॥ ॥ इति श्रीमदूर्ध्वाम्नाये श्रीराधिकायाः कृपाकटाक्षस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

लिप्यंतरण

Munindra-vrinda-vandite triloka-shoka-harini prasanna-vaktra-pankaje nikunja-bhu-vilasini vrajendra-bhanu-nandini vrajendra-sunu-sangate kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (1) Ashoka-vriksha-vallari vitana-mandapa-sthite pravalabala-pallava prabharunanghri-komale varabhayasphuratkare prabhutasampadalaye kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (2) Ananga-ranga mangala-prasanga-bhangura-bhruvam savibhramam sasambhramam drriganta-banapatanaih nirantaram vashikritapratitanandanandane kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (3) Tadit-suvarna-champaka-pradipta-gaura-vigrahe mukha-prabha-parasta-koti-sharadendumandale vichitra-chitra sancharachchakora-shava-lochane kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (4) Madonmadati-yauvane pramoda-mana-mandite priyanuraga-ranjite kala-vilasa-pandite ananyadhanya-kunjarajya-kamakeli-kovide kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (5) Ashesha-havabhava-dhirahirahara-bhushite prabhutashatakumbha-kumbhakumbhi-kumbhasustani prashastamanda-hasyachurna purnasaukhya-sagare kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (6) Mrinala-vala-vallari taranga-ranga-dorlate latagra-lasya-lola-nila-lochanavalokane lalallulanmilanmanojna-mugdha-mohinashrite kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (7) Suvarnamalikanchita-trirekha-kambu-kanthage trisutra-mangali-guna-triratna-dipti-didhite salola-nilakuntala-prasuna-guchchha-gumphite kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (8) Nitamba-bimba-lambamana-pushpamekhalagune prashastaratna-kinkini-kalapa-madhya manjule karindra-shundadandika-varohasaubhagoruke kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (9) Aneka-mantranada-manju nupurarava-skhalat samaja-rajahamsa-vamsha-nikvanati-gaurave vilolahema-vallari-vidambicharu-chankrame kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (10) Ananta-koti-vishnuloka-namra-padmajarchite himadrija-pulomaja-viranchija-varaprade apara-siddhi-riddhi-digdha-satpadanguli-nakhe kada karishyasiha mam kripa-kataksha-bhajanam (11) Makheshvari kriyeshvari svadheshvari sureshvari triveda-bharatishvari pramana-shasaneshvari rameshvari kshameshvari pramoda-kananeshvari vrajeshvari vrajadhipe shriradhike namostute (12) Itimamadbhutam stavam nishamya bhanunandini karotu santatam janam kripa-kataksha-bhajanam bhavettadaiva sanchita trirupa-karma nashanam labhettada vrajendra-sunu-mandala-praveshanam (13) Rakayam cha sitashtamyam dashamyam cha vishuddhadhih ekadashyam trayodashyam yah pathetsadhakah sudhih (14) Yam yam kamayate kamam tam tamapnoti sadhakah radhakripakatakshena bhaktih syat premalakshana (15) Urudaghne nabhidaghne hriddaghne kanthadaghnake radhakundajale sthita yah pathet sadhakah shatam (16) Tasya sarvartha siddhih syad vaksamarthyam tatha labhet aishvaryam cha labhet sakshaddrisha pashyati radhikam (17) Tena sa tatkshanadeva tushta datte mahavaram yena pashyati netrabhyam tat priyam shyamasundaram (18) Nityalila-pravesham cha dadati shri-vrajadhipah atah parataram prarthyam vaishnavasya na vidyate (19)

एक प्रश्न, ग्यारह बार

इस स्तुति का हृदय इसकी टेक है: कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष-भाजनम्, "कब तुम मुझे, यहीं, अपनी कृपा-भरी तिरछी दृष्टि का पात्र बनाओगी?" कटाक्ष आँख के कोने से डाली गई वह दृष्टि है जो प्रिय बिना सिर घुमाए डालता है। भक्त धन नहीं माँगता, मोक्ष भी नहीं, बस इतना चाहता है कि राधा की नज़र उस पर पड़ जाए। पाठ की अंतिम पंक्ति इसका स्रोत ऊर्ध्वाम्नाय तंत्र बताती है, और परंपरा मानती है कि शिव ने इसे पार्वती को सुनाया था।

श्लोक क्या वर्णन करते हैं

  • वे कौन हैं (1): मुनिश्रेष्ठों द्वारा वंदित, तीनों लोकों का शोक हरने वाली, सदा प्रसन्न मुख-कमल वाली, वृंदावन के निकुंजों में विहार करने वाली, राजा वृषभानु की पुत्री और नंदनंदन की संगिनी।
  • उनका कुंज और उनके हाथ (2): अशोक वृक्ष पर लिपटी लताओं के मंडप में विराजमान, नए मूँगे के पत्तों जैसे कोमल लाल चरणों वाली, वर और अभय मुद्रा में उठे हाथों वाली।
  • कृष्ण पर उनका अधिकार (3, 5): नेत्रों के कोनों से छोड़े बाणों से वे नंदनंदन को निरंतर वश में रखती हैं; वे प्रेम की हर कला में निपुण और कुंजों की रानी हैं।
  • उनका सौंदर्य (4, 6–10): बिजली और चंपा से भी उज्ज्वल गौर वर्ण, करोड़ों शरद-चंद्रों को लजाने वाला मुख, तीन रेखाओं वाला शंख-सा कंठ, फूलों से गुँथे काले केश, रत्नजड़ित आभूषण, और झूलती स्वर्ण-लता से भी सुंदर चाल। यह संस्कृत काव्य की शैली है, जिसमें प्रिया के सौंदर्य के माध्यम से दिव्यता का वर्णन होता है।
  • उनकी सर्वोच्चता (11–12): लक्ष्मी द्वारा पूजित, वे पार्वती, शची और सरस्वती को वर देती हैं; वे यज्ञ, कर्म, वेदों और शास्त्रों की ईश्वरी, और व्रज की रानी हैं।

फलश्रुति: कब और कहाँ

श्लोक 13 से 19 कहते हैं कि जो यह स्तुति सुनता है, उसके तीनों प्रकार के संचित कर्म नष्ट होते हैं और वह कृष्ण के मंडल में प्रवेश पाता है। ये पाठ के दिन बताते हैं: पूर्णिमा, शुक्ल अष्टमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी। सबसे प्रसिद्ध निर्देश है गोवर्धन के पास राधा कुंड के जल में जाँघ, नाभि, छाती या कंठ तक खड़े होकर इसका सौ बार पाठ करना। अंत में बताया गया फल वह है जिसे वैष्णव सबसे ऊपर मानता है: राधा-कृष्ण की नित्य लीला में प्रवेश, "जिससे बढ़कर माँगने को कुछ नहीं"।

आज इसका पाठ कैसे होता है

वृंदावन और बरसाना में यह स्तोत्र प्रतिदिन गाया जाता है, और राधाष्टमी पर लगभग हर मंदिर में इसका पाठ होता है। घर पर इसे शाम को राधा-कृष्ण के चित्र के सामने घी का दीपक और फूल रखकर पढ़ें, राधा के 28 नामों के बाद और आरती श्री वृषभानुसुता की से पहले। केवल पहला और बारहवाँ श्लोक, जिसमें श्रीराधिके नमोस्तुते का नमन है, पढ़ना भी एक सुंदर दैनिक साधना है।

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