
कथा कैसे सुनी जाती है
करवा चौथ पर कथा शाम की पूजा का हृदय है। महिलाएँ करवे के चारों ओर साथ बैठती हैं — अक्सर परिवार या मोहल्ले की कोई बुज़ुर्ग महिला कथा कहती हैं — और हाथ में चावल या गेहूँ के कुछ दाने लेकर सुनती हैं। बहुत-से घरों में सुनने वाली महिलाएँ कथा के साथ-साथ धीमे से "हुंकारा" भरती हैं — यह बताने का पुराना ढंग कि कथा केवल कही नहीं जा रही, सुनी भी जा रही है। ये दाने बाद में चंद्रमा को अर्घ्य के साथ अर्पित किए जाते हैं।
हर बाज़ार में मिलने वाली करवा चौथ की छोटी पोथियों में प्रायः यही कथाएँ, इसी क्रम में होती हैं। मुख्य कथा साहूकार की बेटी और उसके सात भाइयों की है। उसके बाद करवा धोबिन की कथा और श्रीकृष्ण द्वारा द्रौपदी को सुनाई कथा आती है, और लगभग हर व्रत कथा की तरह अंत गणेश जी की एक छोटी कहानी से होता है। चारों कथाएँ नीचे दी गई हैं। मुख्य कथा उसी पूरे रूप में दी गई है जैसे पोथियाँ उसे कहती हैं, ख़ासकर राजस्थान और हिंदी भाषी उत्तर भारत में, और जहाँ परिवार इसे अलग ढंग से कहते हैं, वह उसके बाद बताया गया है।
पहली कथा: साहूकार की बेटी और उसके सात भाई
एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी। सातों भाई अपनी इकलौती बहन को इतना प्यार करते थे कि उसके बिना कभी भोजन करने नहीं बैठते थे। जब भी वे जीमते, बहन उनके साथ बैठकर जीमती।
कार्तिक की चौथ का दिन आया। साहूकार की पत्नी, उसकी सातों बहुओं और बेटी — सबने करवा चौथ का व्रत रखा। शाम को जब भाई भोजन करने बैठे, तो बोले, "आओ बहन, हमारे साथ जीम लो।"
बहन बोली, "आज नहीं भैया। आज मेरा करवा चौथ का व्रत है। चाँद उगने के बाद उसे अर्घ्य देकर ही भोजन करूँगी।"
भाइयों से यह सहा नहीं गया कि उनकी बहन चाँद उगने तक भूखी रहे। तब एक भाई ने दीया लिया, दूसरे ने छलनी ली, और वे गाँव के किनारे वाले टीले के पीछे चले गए। वहाँ उन्होंने दीया जलाया और उसे छलनी से ढक दिया, जिससे छलनी के छेदों से उसकी रोशनी उगते चाँद जैसी चमकने लगी। फिर लौटकर बोले, "देखो बहन, चाँद उग आया। जाओ, अर्घ्य दे लो।"
बहन अपनी भाभियों के पास गई और बोली, "चलो, साथ में अर्घ्य दें।" पर भाभियाँ जानती थीं कि भाइयों ने क्या किया है। वे बोलीं, "बाई जी, आपका चाँद उगा है। हमारा तो रात में उगेगा।" भोली बहन उनकी बात का अर्थ नहीं समझी। उसने उस झूठे चाँद को अर्घ्य दिया और भाइयों के साथ भोजन करने बैठ गई।
पहले ही कौर में बाल निकला। दूसरा कौर लेने से पहले ही उसकी ससुराल से लोग उसे लेने आ पहुँचे: "बाई का पति बहुत बीमार है, इसे जल्दी भेजो।" उसी क्षण से सारे अपशकुन होने लगे। जब उसने जाने के लिए कपड़े निकालने को संदूक खोला, तो सबसे पहले सफ़ेद कपड़ा निकला — विधवा का रंग। चुनने का समय नहीं था, और उसे सफ़ेद कपड़ों में ही ससुराल भेज दिया गया।
विदा करते समय माँ ने उसके पल्लू में एक सोने का सिक्का बाँध दिया और कहा, "रास्ते में जो भी मिले, उसके पैर छूती जाना। जो तुझे सुहागन रहने का आशीर्वाद दे, उसे यह सोने का सिक्का दे देना।" बेटी ने वैसा ही किया। रास्ते में जो भी मिला, उसके पैर छुए, पर किसी ने उसे सुहाग का आशीर्वाद नहीं दिया। उलटे सब यही कहते, "यही है वह, जिसने भाइयों के सुख के लिए असमय चाँद उगवाया।"
ससुराल के दरवाज़े पर उसकी सबसे छोटी ननद, एक छोटी-सी बच्ची, खड़ी थी। बेटी ने उसके भी पैर छुए, और बच्ची बोली, "शीतल रहो, सपूती रहो, बुढ़ापे तक सुहागन रहो।" यह सुनकर बेटी ने सोने का सिक्का ननद को दे दिया और आशीर्वाद को सँभालने के लिए पल्लू में गाँठ बाँध ली।
घर के भीतर सास ने उसे बैठने को पीढ़ा तक नहीं दिया। बोली, "ऊपर मरा पड़ा है, जा, उसके पास जाकर बैठ।" बेटी ऊपर गई तो देखा, उसका पति मरा पड़ा है। वह उसी समय उसके पास बैठ गई, और फिर वहाँ से नहीं उठी। वह दिन-प्रतिदिन पति के शरीर की सेवा करती रही। घर वाले बची हुई रोटियों के टुकड़े उसके लिए भेज देते, और उसी पर उसके दिन कटने लगे।
कुछ दिनों बाद मार्गशीर्ष (मंगसिर) की चौथ आई। चौथ माता प्रकट होकर बोलीं, "करवा ले, भाइयों की बहन, करवा ले! करवा ले, व्रत तोड़ने वाली, करवा ले!" बेटी ने उनके पैर पकड़ लिए। "आपको मेरा सुहाग लौटाना पड़ेगा," वह बोली। पर मंगसिर की चौथ ने कहा, "पौष की चौथ आएगी, वह मुझसे बड़ी है। वही तुझे तेरा सुहाग देगी।"
ऐसे ही महीने पर महीने बीतते गए। साल की हर चौथ आती, वही शब्द पुकारती, और वही बात कहती: "मुझसे बड़ी चौथ आ रही है, उसी से अपना सुहाग माँगना।" अंत में आश्विन (आसोज) की चौथ आई, और उसने उसे सच बताया: "कार्तिक की चौथ, करवा चौथ, तुझसे नाराज़ है। जब वह आए, उसके पैरों में पड़ जाना। वही तुझे तेरा सुहाग लौटाएगी।"
फिर गरजती-घुमड़ती स्वयं करवा चौथ आई। "करवा ले, भाइयों की प्यारी बहन!" उसने पुकारा। "करवा ले, दिन में चाँद उगाने वाली! करवा ले, व्रत तोड़ने वाली, करवा ले!" साहूकार की बेटी ने उसके पैर पकड़ लिए और रोने लगी। "हे चौथ माता, मेरा सुहाग लौटा दो!"
देवी बोलीं, "असमय चाँद उगाने वाली, मेरे पैर क्यों पकड़ती है?"
"मेरी भूल क्षमा करो चौथ माता," बेटी गिड़गिड़ाई, "और मुझे मेरा सुहाग दे दो।" उसने पैर नहीं छोड़े।
अंत में चौथ माता प्रसन्न हुईं। उन्होंने अपनी छोटी उँगली से मेहँदी निकाली, आँखों से काजल लिया और माथे के टीके से रोली ली, और उन्हें पति पर छिड़क दिया। छींटा पड़ते ही पति उठकर बैठ गया — जीवित।
पति-पत्नी ने बड़े उत्साह से चौथ माता का उत्सव मनाया। चूरमा बनाया, चौथ की कहानी सुनी और करवा मनसा (दान किया)। चौथ माता को धोक देकर दोनों ने साथ भोजन किया, और चौपड़-पासा खेलने बैठ गए।
नीचे से दासी उस दिन की रोटी के टुकड़े लेकर ऊपर आई। सीढ़ियों के ऊपर पहुँचकर जब उसने दोनों को चौपड़ खेलते देखा, तो दौड़कर सास को सारी बात बताई। सास ऊपर आई और बेटे को जीता-जागता देखकर बहुत प्रसन्न हुई। उसने बहू-बेटे से पूछा, "यह कैसे हुआ?" बहू बोली, "मुझ पर तो करवा चौथ माता ने सुहाग लौटाने की कृपा की है।" उसने सास के पैर छुए, और इस बार सास ने उसे बार-बार सुहागन रहने का आशीर्वाद दिया।
हे चौथ माता, जैसे साहूकार की बेटी को सुहाग दिया, वैसे ही सबको देना। कहते-सुनते को, हुंकारा भरते को — पीहर और ससुराल में सबको सुख-शांति से रखना।
दूसरे परिवार इसे कैसे कहते हैं
- सबसे छोटी भाभी। हिंदी भाषी बहुत-से घरों में झूठा चाँद सबसे छोटे भाई ने उगाया था, इसलिए उसकी पत्नी के पास ही यह भूल सुधारने की शक्ति होती है। जब करवा चौथ फिर आती है, तो बेटी अपनी सबसे छोटी भाभी के पैरों में गिर पड़ती है और जब तक वह मदद न करे, छोड़ती नहीं। भाभी अपनी छोटी उँगली चीरकर अमृत की एक बूँद पति के मुँह में डालती है, और वह "जय गणेश, जय गौरी" कहता हुआ जीवित हो उठता है।
- श्मशान के पास की झोपड़ी। कुछ कथाओं में बेटी पति का दाह-संस्कार नहीं होने देती, और गाँव वाले उसे पति के शरीर के साथ एक झोपड़ी में छोड़ देते हैं, जहाँ उसकी छोटी ननद उसे भोजन दे जाती है। वह वहीं साल की हर चौथ का व्रत रखती है, और करवा चौथ पर ननद से सोलह शृंगार का सामान मँगवाकर पूरा शृंगार करती है, उसे चौथ माता को अर्पित करती है, और अपना सुहाग वापस पाती है।
- इंद्राणी और बारह व्रत। श्रीकृष्ण द्वारा द्रौपदी को सुनाई कथा (नीचे तीसरी कथा) में कन्या एक ब्राह्मण की बेटी है, और इंद्राणी उसे बारह महीने हर चौथ का व्रत रखने को कहती हैं।
- गणेश जी। कुछ कथाओं में बताया जाता है कि व्रत टूटने पर चतुर्थी के स्वामी गणेश जी अप्रसन्न हुए, और पति बीमार पड़ गया और घर का सारा धन उसकी बीमारी में लग गया — जब तक बेटी ने उनसे क्षमा माँगकर फिर से व्रत नहीं रखा।
कुछ परिवार कन्या को वीरावती या करवा भी कहते हैं। विवरण कुछ भी हों, हर रूप ज़रूरी बात पर एकमत है: व्रत एक छल से टूटा, पत्नी ने कभी हार नहीं मानी, और श्रद्धा से निभाया गया व्रत उसका सुहाग लौटा लाया।
दूसरी कथा: करवा धोबिन
बहुत समय पहले तुंगभद्रा नदी के किनारे एक गाँव में करवा नाम की एक पतिव्रता धोबिन अपने पति के साथ रहती थी। उसका पति बूढ़ा और निर्बल था। एक दिन जब वह नदी किनारे कपड़े धो रहा था, तभी अचानक एक मगरमच्छ आया, उसका पैर अपने जबड़ों में दबाया, और उसे यमलोक की ओर घसीटने लगा।
घबराया हुआ बूढ़ा ठीक से चिल्ला भी न सका। बस पत्नी का नाम पुकार सका: "करवा! करवा!"
करवा दौड़ी हुई आई। मगरमच्छ उसके पति को यमलोक पहुँचाने ही वाला था। क्षण भर भी सोचे बिना उसने मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया, और उसकी पतिव्रता शक्ति ने मगर को जकड़ लिया। फिर मगर को साथ घसीटते हुए वह सीधे यमराज के द्वार पहुँची।
"हे भगवन्," वह बोली, "इस मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। इस अपराध के दंड में इसे नरक भेज दीजिए।"
यमराज बोले, "अभी मगर की आयु शेष है। मैं इसे समय से पहले यमलोक नहीं भेज सकता।"
करवा ने कहा, "अगर आप मेरे पति को बचाने में मेरी सहायता नहीं करेंगे, तो मैं आपको श्राप देकर नष्ट कर दूँगी।"
करवा का साहस देखकर यमराज भी डर गए। उन्होंने मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु का वरदान दिया। कहते हैं, उसी दिन से कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का व्रत करवा के नाम पर, करवा चौथ के रूप में रखा जाने लगा।
तीसरी कथा: श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को सुनाई कथा
एक बार, जब पांडव वन में थे, अर्जुन तपस्या करने नीलगिरि पर्वत पर गए। द्रौपदी चिंतित हुईं। उन पर तरह-तरह की विघ्न-बाधाएँ आती रहती थीं, और जो अर्जुन उनसे निपटते, वे यहाँ नहीं थे। तब उन्होंने श्रीकृष्ण का ध्यान किया, और भगवान वहाँ प्रकट हुए।
द्रौपदी ने उनसे अपने कष्टों का कोई उपाय पूछा। श्रीकृष्ण बोले, "एक बार पार्वती जी ने भी शिव जी से यही प्रश्न किया था। तब उन्होंने बताया था कि करवा चौथ का व्रत गृहस्थी में आने वाली छोटी-बड़ी विघ्न-बाधाओं को दूर करता है।" फिर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को यह कथा सुनाई।
प्राचीन काल में एक धर्मपरायण ब्राह्मण के सात पुत्र और एक पुत्री थी। बड़ी होने पर पुत्री का विवाह हुआ, और कार्तिक की चौथ को उसने करवा चौथ का व्रत रखा। चंद्रोदय से बहुत पहले ही सात भाइयों की लाड़ली बहन को भूख सताने लगी, और उसका फूल-सा चेहरा मुरझा गया। भाइयों से बहन का यह कष्ट देखा न गया। उन्होंने उससे चंद्रोदय से पहले भोजन कर लेने की विनती की, पर वह न मानी। तब भाइयों ने स्नेहवश पीपल के पेड़ की आड़ में प्रकाश करके कहा, "देखो, चाँद निकल आया। उठो, अर्घ्य देकर भोजन करो।" वह उठी, चंद्रमा को अर्घ्य दिया, और भोजन कर लिया।
भोजन करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। वह रोने-बिलखने लगी। संयोग से देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी अपनी दासियों के साथ वहाँ से जा रही थीं। रोने की आवाज़ सुनकर वे वहाँ आईं और कारण पूछा, और ब्राह्मण कन्या ने सारा हाल कह सुनाया।
तब इंद्राणी बोलीं, "तुमने करवा चौथ के व्रत में चंद्रोदय से पहले अन्न-जल ग्रहण कर लिया, इसी से तुम्हारे पति की मृत्यु हुई है। अब अगर तुम मृत पति की सेवा करते हुए बारह महीने हर चौथ का व्रत विधि से रखो, और फिर करवा चौथ को गौरी, शिव, गणेश और कार्तिकेय के साथ चंद्रमा की विधिवत पूजा करो, और चंद्रोदय के बाद अर्घ्य देकर ही अन्न-जल ग्रहण करो, तो तुम्हारे पति अवश्य जीवित हो उठेंगे।"
ब्राह्मण कन्या ने ठीक वैसा ही किया। अगले वर्ष बारह महीनों की चौथ सहित उसने विधिपूर्वक करवा चौथ का व्रत किया, और व्रत के प्रभाव से उसका पति जीवित हो उठा।
यह कथा कहकर श्रीकृष्ण द्रौपदी से बोले, "अगर तुम भी श्रद्धा और विधि से यह व्रत करो, तो तुम्हारे सारे दुख दूर होंगे और सुख-सौभाग्य तथा धन-धान्य में वृद्धि होगी।" द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के कहे अनुसार करवा चौथ का व्रत रखा, और कहते हैं कि उसी व्रत के प्रभाव से महाभारत के युद्ध में कौरवों की हार और पांडवों की जीत हुई।
गणेश जी की कहानी
उत्तर भारत में लगभग हर व्रत कथा गणेश जी की एक छोटी कहानी से पूरी होती है, क्योंकि उनके बिना कोई पूजा पूरी नहीं होती। करवा चौथ पर प्रायः यह कहानी कही जाती है।
एक बुढ़िया माई थी, जो मिट्टी के गणेश जी की पूजा करती थी। रोज़ नए गणेश बनाती, और रोज़ नहलाते समय वे गल जाते। उसके घर के पास एक सेठ का मकान बन रहा था। वह मिस्त्रियों के पास गई और बोली, "मेरे लिए पत्थर के गणेश जी गढ़ दो।"
मिस्त्री बोले, "जितनी देर में हम तेरे पत्थर के गणेश गढ़ेंगे, उतनी देर में तो पूरी दीवार चिन देंगे।" और उन्होंने उसे लौटा दिया।
बुढ़िया बोली, "राम करे, तुम्हारी दीवार टेढ़ी हो जाए।"
उसी क्षण से दीवार सीधी खड़ी ही नहीं हुई। मिस्त्री चिनते और ढहा देते, फिर चिनते और फिर ढहा देते, और शाम तक कुछ भी नहीं हुआ। शाम को सेठ आया और काम आगे बढ़ा न देखकर कारण पूछा। मिस्त्री बोले, "एक बुढ़िया आई थी, कह रही थी मेरे पत्थर के गणेश गढ़ दो। हमने मना किया तो उसने कहा तुम्हारी दीवार टेढ़ी हो जाए। तब से दीवार सीधी नहीं बन रही। बनाते हैं और ढहा देते हैं।"
सेठ ने बुढ़िया को बुलवाया। बोला, "हम तेरे लिए सोने के गणेश गढ़वा देंगे, बस हमारी दीवार सीधी कर दे।" सेठ ने बुढ़िया को सोने के गणेश गढ़वा दिए, और सेठ की दीवार सीधी हो गई।
हे गणेश जी, जैसे सेठ की दीवार सीधी की, वैसे सबकी करना।
इन कथाओं का अर्थ
चारों कथाएँ व्रत को अलग-अलग पक्षों से दिखाती हैं। पहली कथा स्वयं व्रत के बारे में है: कि व्रत असली चाँद उगने तक रखा जाता है, और किसी को कष्ट से बचाने वाला प्रेम हमेशा भलाई नहीं होता। यह उस पत्नी की कथा भी है जिसने महीने पर महीने हार नहीं मानी, जब तक देवी पसीज नहीं गईं। करवा धोबिन उसी निष्ठा को साहस के रूप में दिखाती है — इतना साहस कि कच्चे धागे से मगर बँध जाए और स्वयं यमराज का सामना हो सके। द्रौपदी को सुनाई कथा इस व्रत को शिव-पार्वती से जोड़ती है, जिनके दांपत्य का यह सम्मान करता है, और केवल पति की नहीं, पूरे घर की रक्षा से। और गणेश जी की कहानी, हमेशा की तरह, माँगती है कि हमारे जीवन में जो कुछ टेढ़ा है, वह सीधा हो जाए।
इस वर्ष की तिथि, पूजा मुहूर्त और आपके शहर में चाँद निकलने के समय के लिए हमारा करवा चौथ 2026 लेख देखें। पूजा के समय बहुत-सी महिलाएँ पार्वती चालीसा भी पढ़ती हैं या जय पार्वती माता गाती हैं, और अंत में गणेश जी की आरती करती हैं।
