मूल पाठ
हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकरप्रिया। तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्॥ नाम मंत्र: ॐ पार्वत्यै नमः॥ ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः॥
लिप्यंतरण
He Gauri Shankarardhangi yatha tvam Shankarapriya Tatha mam kuru kalyani kantakantam sudurlabham Naam mantra: Om Parvatyai Namah Om Umamaheshvarabhyam Namah
मंत्र क्या कहता है
यह श्लोक एक सीधी, निजी विनती है, और एक तुलना पर टिका है। हे गौरि शंकरार्धांगि: "हे गौरी, तुम जो शंकर के शरीर का आधा भाग हो", यानी अर्धनारीश्वर रूप, जिसमें शिव और पार्वती एक शरीर में हैं। यथा त्वं शंकरप्रिया: "जैसे तुम शंकर की प्रिया हो"। तथा मां कुरु कल्याणि: "वैसे ही, हे कल्याणी, मुझे बनाओ", कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्: "प्रिय पति की प्रियतमा, जो अत्यंत दुर्लभ है"।
इसका भाव सरल और मार्मिक है। पार्वती ने शिव को आसानी से नहीं पाया; वर्षों के तप से पाया। इसलिए भक्त उसी देवी से प्रेम और सम्मान वाला विवाह माँगता है जो जानती हैं कि इसके लिए क्या करना पड़ता है।
कौन जपे, और कैसे
परंपरा से इसे अच्छे वर की कामना वाली कुँवारी कन्याएँ और वे स्त्रियाँ जपती हैं जिनके विवाह में विलंब हो रहा हो। सामान्य विधि:
- सोमवार, श्रावण के मंगलवार (मंगला गौरी व्रत) या हरतालिका तीज से आरंभ करें।
- स्नान के बाद शिव-पार्वती के साथ वाले चित्र के सामने घी का दीपक जलाएँ, और पार्वती को लाल फूल, सिंदूर और अक्षत चढ़ाएँ।
- रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला पर 108 बार जप करें, ध्यान केवल ध्वनि पर नहीं, अर्थ पर भी रखें।
- जय पार्वती माता आरती से समापन करें।
बहुत-से परिवार पार्वती चालीसा भी पढ़ते हैं, जिसमें वह तप विस्तार से वर्णित है जिसकी ओर यह श्लोक संकेत करता है।
छोटे नाम मंत्र
बिना किसी विशेष कामना के, रोज़ की पूजा में दो छोटे मंत्र प्रयोग होते हैं। ॐ पार्वत्यै नमः, "पार्वती को नमस्कार", हर फूल या अक्षत के साथ बोला जाता है। ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः, "उमा और महेश्वर को नमस्कार", दंपति का एक साथ सम्मान करता है; व्याकरण का द्विवचन रूप -आभ्यां का अर्थ है "उन दोनों को"। विवाहित दंपतियों के लिए और सोमवार की शिव-पार्वती पूजा में यही स्वाभाविक मंत्र है।
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