
एक त्योहार, कई कथाएँ
दशहरा, यानी विजयादशमी, आश्विन शुक्ल दशमी को पड़ता है, और यह किसी एक कथा से बँधा नहीं है। उत्तर भारत में यह रावण पर राम की विजय का दिन है। बंगाल और पूर्वी भारत में यह दुर्गा पूजा का समापन है, और इसके पीछे की कथा महिषासुर पर देवी की विजय है। महाराष्ट्र और कर्नाटक इसमें शमी वृक्ष में छिपाए गए पांडवों के शस्त्रों की कथा जोड़ते हैं, और महाराष्ट्र राजा रघु के कोषागार में बरसे स्वर्ण की भी। हर कथा अलग ग्रंथ से आती है, और ये ग्रंथ तिथियों पर एकमत नहीं हैं। नीचे हर कथा वैसे ही दी गई है जैसे उसका मूल ग्रंथ उसे कहता है, और जहाँ लोकप्रिय रूप उससे अलग है, वहाँ वह भी बताया गया है।
राम और रावण: अंतिम युद्ध
लंका का युद्ध वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में वर्णित है। अंतिम चरण तक रावण कुंभकर्ण, इंद्रजीत और अपनी अधिकांश सेना खो चुका था, और स्वयं राम से लड़ने निकला। राम भूमि पर खड़े होकर रथ पर सवार राजा से लड़ रहे थे, और देवताओं को यह युद्ध असमान लगा। इसलिए इंद्र ने अपने सारथी मातलि के साथ अपना रथ, कवच, बाण और एक शक्ति भेजी (सर्ग 102)।
निर्णायक द्वंद्व से पहले जब राम थककर खड़े थे, तब देवताओं के साथ युद्ध देखने आए महर्षि अगस्त्य उनके पास आए और उन्हें सूर्यदेव का स्तोत्र आदित्य हृदय सिखाया। अगस्त्य ने कहा कि इससे वे युद्ध में हर शत्रु को जीत सकेंगे (सर्ग 105)।
इसके बाद युद्ध का सबसे विचित्र भाग आया। राम जब भी रावण का एक सिर काटते, उसकी जगह दूसरा उग आता। वाल्मीकि कहते हैं कि इस तरह सौ सिर काटे गए, फिर भी रावण के मरने का कोई लक्षण नहीं दिखा। यह द्वंद्व आकाश में, भूमि पर और पर्वत पर, सात दिन और रात बिना एक क्षण रुके चलता रहा (सर्ग 107)।
अंत में मातलि ने ही राम को वह अस्त्र याद दिलाया जिसका उन्होंने अभी तक प्रयोग नहीं किया था: ब्रह्मा का बनाया हुआ बाण, जो महर्षि अगस्त्य ने उन्हें दिया था। राम ने उसे मंत्रों से अभिमंत्रित करके छोड़ा। वह रावण की छाती में लगा, उसका हृदय चीरता हुआ धरती में समा गया, और फिर चुपचाप राम के तरकश में लौट आया। रावण के हाथ से धनुष छूट गया, और वह प्राणहीन होकर रथ से भूमि पर गिर पड़ा (सर्ग 108)।
सबसे प्रसिद्ध रूप: नाभि का अमृत कुंड
बहुत से लोग बचपन से सुनते आए हैं कि रावण इसलिए नहीं मर रहा था क्योंकि उसकी नाभि में अमृत था। यह प्रसंग वाल्मीकि का नहीं, तुलसीदास के रामचरितमानस (लंकाकांड) का है। जब राम के बाणों से कटे सिर और भुजाएँ बार-बार उग आते, तब विभीषण ने उन्हें रहस्य बताया:
नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥
"इसके नाभिकुंड में अमृत का निवास है। हे नाथ! रावण उसी के बल पर जीता है।"
राम ने धनुष को कान तक खींचकर इकतीस बाण छोड़े:
खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥ (दोहा 102)
एक बाण ने नाभि का अमृत सोख लिया, और बाकी तीस उसके सिरों और भुजाओं में लगे (दस सिर और बीस भुजाएँ, कुल तीस)। तुलसीदास आगे कहते हैं कि रावण का तेज प्रभु के मुख में समा गया, और यह देखकर शिव और ब्रह्मा हर्षित हुए। उत्तर भारत की रामलीलाएँ अधिकतर रामचरितमानस पर आधारित हैं, इसीलिए वाल्मीकि के ब्रह्मास्त्र के बजाय यही रूप सबसे अधिक जाना जाता है।
"वैर मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है"
वाल्मीकि में इसके बाद जो होता है, वह बहुत कम सुनाया जाता है। विभीषण अपने भाई को छोड़कर राम के पक्ष में आए थे, और अब वे उसके लिए शोक कर रहे थे। पहले उन्होंने रावण का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया, यह कहकर कि वह भाई के वेश में शत्रु था। राम ने यह स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि रावण अधर्मी था, पर साथ ही तेजस्वी, बलवान और वीर भी था, ऐसा योद्धा जिसे इंद्र भी नहीं जीत सके। फिर उन्होंने कहा:
मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्।
"वैर मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है। हमारा प्रयोजन पूरा हो चुका है।" (युद्धकांड 111.102; श्लोक संख्या अलग-अलग संस्करणों में भिन्न है।) राम ने कहा कि अब रावण जितना विभीषण का है उतना ही उनका भी, और उसका संस्कार होना चाहिए। विभीषण ने अंतिम संस्कार किया, और बाद में समुद्र के जल से उनका लंका के राजा के रूप में अभिषेक हुआ (सर्ग 112)। पुतले जलते समय यह याद रखने योग्य है कि रामायण के नायक ने स्वयं युद्ध समाप्त होने के बाद रावण से वैर रखने से इनकार कर दिया था।
युद्ध से पहले राम की देवी उपासना
राम की कथा का नवरात्रि से संबंध दो बाद के ग्रंथों से आता है। देवी भागवत पुराण (तृतीय स्कंध, अध्याय 30) में देवर्षि नारद राम को सीता के वियोग में दुखी पाते हैं और उन्हें रावण वध का उपाय बताते हैं: इसी आश्विन मास में उपवास, जप और हवन के साथ देवी का नवरात्र व्रत करो। नारद स्वयं उनके पुरोहित बनने को कहते हैं। राम एक पर्वत की चोटी पर वेदी बनाकर नौ दिन उपवास करते हैं। अष्टमी की रात देवी सिंह पर सवार होकर प्रकट होती हैं। वे राम से कहती हैं कि तुम नारायण के अंश हो और रावण के विनाश के लिए जन्मे हो, और उन्हें विजय का वरदान देती हैं। दशमी को राम विजया पूजा करते हैं, और उसके बाद ही समुद्र तट की ओर जाकर सेतु बाँधते हैं और रावण का वध करते हैं। यानी इस कथा में दशमी वह दिन है जब राम देवी का आशीर्वाद लेकर निकलते हैं, रावण के वध का दिन नहीं।
बंगाल यह कथा 15वीं शताब्दी की कृत्तिवासी रामायण से कहता है, जहाँ इस पूजा को अकाल बोधन, यानी देवी का असमय जागरण, कहा गया है, क्योंकि राम ने उनका आवाहन वसंत के बजाय शरद ऋतु में किया था। राम को देवी को 108 नीलकमल चढ़ाने थे, और देवी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक कमल छिपा दिया। कमलनयन कहलाने वाले राम ने गिनती पूरी करने के लिए अपनी एक आँख निकालने को बाण उठा लिया, तभी देवी प्रकट हुईं और उन्हें रोक दिया। इसी कथा के कारण बंगाल की दुर्गा पूजा शरद ऋतु में होती है, और उसमें आज भी 108 कमल चढ़ाए जाते हैं।
दुर्गा और महिषासुर
बंगाल इस दिन जिस कथा का उत्सव मनाता है, वह दुर्गा सप्तशती यानी देवी माहात्म्य (मार्कंडेय पुराण के अध्याय 81 से 93) से आती है, जिसका पाठ पूरे नवरात्र होता है। महिषासुर ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। देवताओं का क्रोध उनके शरीर से तेज बनकर निकला, और वह तेज मिलकर एक देवी के रूप में प्रकट हुआ, जिन्हें हर देवता ने अपना अस्त्र दिया।
तीसरे अध्याय में स्वयं महिषासुर से उनका युद्ध है, जो बार-बार रूप बदलता रहा। देवी ने जब उसे पाश में बाँधा, तो उसने भैंसे का रूप छोड़कर सिंह का रूप ले लिया। देवी उसका सिर काटने चलीं, तो वह तलवार लिए पुरुष बन गया। देवी ने उस पुरुष को बाणों से बींधा, तो वह विशाल हाथी बनकर सूँड़ से उनके सिंह को खींचने लगा, और देवी ने तलवार से उसकी सूँड़ काट दी। फिर वह दोबारा भैंसा बन गया और तीनों लोकों को हिला दिया। चंडिका ने बार-बार दिव्य पान किया, लाल आँखों से हँसीं, और उससे कहा कि जब तक मैं यह पान कर रही हूँ, तब तक गरज ले, क्योंकि जल्द ही तेरी मृत्यु पर देवता गरजेंगे। वे उछलकर उस पर चढ़ गईं, पैर से उसकी गर्दन दबाई और शूल से प्रहार किया। उनके पैर के नीचे दबा महिषासुर अपने असली रूप में भैंसे के मुख से आधा ही निकल पाया था कि देवी ने अपनी बड़ी तलवार से उसका सिर काट दिया।
ग्रंथ में स्वयं यह नहीं लिखा कि युद्ध नौ दिन चला। देवी के नौ रातों तक लड़ने और दसवें दिन जीतने की मान्यता इस बात से आती है कि त्योहार को कथा के साथ जोड़कर देखा जाता है। बंगाल में दशमी बिजया है: पूजा के लिए मायके आई देवी फिर कैलाश लौट जाती हैं, और उनकी प्रतिमा का विसर्जन होता है। विवाहित स्त्रियाँ सिंदूर खेला में एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, और लोग बड़ों से मिलने जाते हैं और मिठाइयाँ बाँटते हैं।
पांडव और शमी वृक्ष
दशहरा की एक और परंपरा महाभारत के विराट पर्व से आती है। पांडवों को वनवास का तेरहवाँ वर्ष छिपकर बिताना था। पहचाने जाने पर उन्हें बारह वर्ष और वन में रहना पड़ता। राजा विराट के नगर में जाने से पहले उन्हें अपने शस्त्र छिपाने थे, विशेषकर अर्जुन का गांडीव धनुष, जिसे कोई भी पहचान लेता। अर्जुन ने श्मशान के पास, एक दुर्गम चोटी के निकट, एक विशाल शमी वृक्ष चुना। शस्त्र उसकी ऐसी डालियों पर बाँधे गए जो टूटें नहीं और जहाँ वर्षा न पहुँचे। फिर पांडवों ने पेड़ पर एक शव लटका दिया ताकि दुर्गंध से लोग दूर रहें। जब चरवाहों ने पूछा, तो उन्होंने कहा कि यह हमारी एक सौ अस्सी वर्ष की माता का शव है, जिसे हमने अपने पूर्वजों की रीति के अनुसार लटकाया है (अध्याय 5)।
वर्ष के अंत में कौरवों ने विराट की गायें हर लीं। पूरा वर्ष नृत्य शिक्षक बृहन्नला के वेश में बिताने वाले अर्जुन डरे हुए युवा राजकुमार उत्तर के सारथी बने। वे रथ को शमी वृक्ष तक ले गए, उत्तर से शस्त्र उतरवाए, और गांडीव से भीष्म, द्रोण, कर्ण और पूरी कौरव सेना को पीछे हटा दिया। महाभारत इस घटना की कोई तिथि नहीं देता, पर परंपरा शस्त्रों की इस वापसी को विजयादशमी से जोड़ती है। इसीलिए दशहरा पर शमी पूजन होता है, इन दिनों शस्त्रों और औज़ारों की पूजा होती है (आयुध पूजा, जो दक्षिण में प्रायः नवमी को होती है), और पुराने समय में राजा इस दिन विधिपूर्वक अपनी सीमा पार करते थे (सीमोल्लंघन)।
रघु, कौत्स और स्वर्ण की वर्षा
अंतिम कथा कालिदास की है, रघुवंश के पाँचवें सर्ग से, और यह राम के परदादा रघु की है। रघु ने अभी-अभी विश्वजित यज्ञ पूरा किया था, जिसमें राजा अपना सब कुछ दान कर देता है। तभी महर्षि वरतंतु का युवा शिष्य कौत्स उनके पास आया। उसकी शिक्षा पूरी हो चुकी थी और उसे गुरुदक्षिणा चुकानी थी। रघु के पास इतना कम बचा था कि उन्होंने अतिथि का स्वागत मिट्टी के पात्र में अर्घ्य देकर किया, और यह देखकर कौत्स बिना कुछ माँगे लौटने को तैयार हो गया। रघु के आग्रह पर कौत्स ने बताया कि उसके गुरु ने पहले कहा था कि वर्षों की निष्ठापूर्ण सेवा ही पर्याप्त दक्षिणा है। पर कौत्स के हठ से खीझकर गुरु ने दक्षिणा बताई: चौदह करोड़ मुद्राएँ, सिखाई गई चौदह विद्याओं में से हर एक के लिए एक करोड़ (5.20–21)।
वित्तस्य विद्यापरिसंख्यया मे कोटीश्चतस्रो दश चाहरेति॥
रघु नहीं चाहते थे कि कहा जाए कि कोई विद्वान उनके द्वार से खाली हाथ लौटा। उन्होंने कौत्स से दो-तीन दिन रुकने को कहा और धन के देवता कुबेर से धन लेने का निश्चय किया। उस रात वे शस्त्रों से भरे रथ में ही सोए, ताकि भोर होते ही कैलाश पर ऐसे चढ़ाई कर सकें मानो कुबेर कोई साधारण पड़ोसी राजा हों। सुबह चकित कोषाध्यक्षों ने आकर बताया कि रात में आकाश से कोषागार के बीचोंबीच स्वर्ण की वर्षा हुई है (5.29)। रघु ने वह सारा स्वर्ण कौत्स को दे दिया, पर कौत्स ने केवल उतना ही लिया जितना गुरु को देना था। कालिदास कहते हैं कि साकेत (अयोध्या) के लोगों ने दोनों की प्रशंसा की: उस याचक की जिसे गुरुदक्षिणा से अधिक कुछ नहीं चाहिए था, और उस राजा की जिसने माँग से अधिक दिया। कौत्स ने रघु को अपने ही समान गुणवान पुत्र का आशीर्वाद दिया, और वह पुत्र अज थे, राम के दादा।
महाराष्ट्र में यह कथा एक अलग अंत के साथ कही जाती है। वहाँ के अनुसार स्वर्ण शमी और आपटा के पत्तों पर बरसा था, और विजयादशमी के दिन बरसा था। इसीलिए वहाँ दशहरा पर लोग आपटा के पत्ते "सोना" कहकर एक-दूसरे को देते हैं और कहते हैं "सोनं घ्या, सोन्यासारखं राहा" (सोना लो, और सोने जैसे बने रहो)। रघुवंश में स्वयं इतना ही लिखा है कि स्वर्ण कोषागार में बरसा।
पुतले क्यों जलाए जाते हैं
रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाने की बात इनमें से किसी ग्रंथ में नहीं है। यह रामलीला से निकली परंपरा है, जिसमें दशहरा से पहले के दिनों में रामायण का लोक नाट्य मंचन होता है (वाराणसी के रामनगर में यह लगभग एक महीने चलती है)। परिवार चाहे कोई भी कथा सुनाए, सब कथाओं का रूप एक ही है: धैर्य और ईश्वर की सहायता से मिली विजय, और उसके बाद एक नई शुरुआत। इसीलिए विजयादशमी नए काम शुरू करने का भी दिन है, जैसे विद्यारंभ, नया काम और यात्रा। त्योहार की तिथि, विधि और क्षेत्रीय परंपराओं के लिए देखें दशहरा।
