मूल पाठ
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्माऽमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॥ बृहदारण्यकोपनिषद् १.३.२८ ॥
लिप्यंतरण
Om asato ma sadgamaya Tamaso ma jyotirgamaya Mrityorma'mritam gamaya Om shantih shantih shantih ||
यज्ञ से आई प्रार्थना
ये पंक्तियाँ आज भी रोज़ बोली जाने वाली सबसे पुरानी प्रार्थनाओं में से हैं। ये बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28) से हैं, और इनका मूल प्रसंग बहुत स्पष्ट है। सोम-यज्ञ में प्रस्तोता नाम का पुरोहित पवमान गान शुरू करता है, वे गान जो सोम के शुद्ध होते समय गाए जाते हैं। उपनिषद् कहता है कि तब यज्ञ का यजमान धीरे से बोले: असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमय। इसीलिए इसे आज भी पवमान मंत्र कहते हैं, हालाँकि आज इसे बोलने वालों में से शायद ही किसी ने सोम-यज्ञ देखा हो।
उपनिषद् अपनी प्रार्थना स्वयं समझाता है
इस अंश की अनोखी बात यह है कि उपनिषद् तुरंत इन शब्दों की व्याख्या करता है। जब कोई कहता है "मुझे असत् से सत् की ओर ले चलो", तो उपनिषद् के अनुसार असत् मृत्यु है और सत् अमरता, इसलिए इसका अर्थ है "मुझे अमर करो"। जब कोई कहता है "अंधकार से प्रकाश की ओर", तो अंधकार मृत्यु है और प्रकाश अमरता, इसलिए फिर अर्थ है "मुझे अमर करो"। और तीसरी पंक्ति, "मृत्यु से अमरता की ओर", के बारे में वह बस इतना कहता है कि इसमें कुछ छिपा नहीं।
यानी उपनिषद् की अपनी व्याख्या में तीनों पंक्तियाँ तीन माँगें नहीं, एक ही माँग हैं, तीन तरह से कही गई, हर बार पहले से थोड़ी अधिक सीधी। बाद के आचार्यों ने इसमें और अर्थ देखे: अज्ञान से ज्ञान, माया से सत्य, परिवर्तनशील से अपरिवर्तनशील। पर मूल व्याख्या याद रखने योग्य है। यह मृत्यु से परे जाने की प्रार्थना है।
प्रकाश और अंधकार
बीच की पंक्ति, तमसो मा ज्योतिर्गमय, का अपना अलग जीवन बन गया है। यह अनगिनत विद्यालयों और संस्थाओं का ध्येय-वाक्य है, द्वारों के ऊपर लिखी जाती है, और हर दीपावली पर दीपों के पर्व के अर्थ के रूप में उद्धृत होती है। बिंब सहज बैठता है: अंधेरे में जलाया गया दीपक अज्ञान को पीछे धकेलती समझ का सबसे स्वाभाविक चित्र है।
यह कब बोला जाता है
असतो मा का पाठ अध्ययन, ध्यान और योग सत्रों के आरंभ या अंत में, विद्यालय की प्रार्थना-सभा में, प्रवचन की शुरुआत में, दीपावली पर, और किसी भी शुभ अवसर पर दीप जलाते समय होता है। इसके बाद अक्सर ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः, यानी शांति की तीन बार प्रार्थना, आती है। यह शोक के क्षणों में भी उपयुक्त है, क्योंकि इसकी अंतिम पंक्ति सीधे मृत्यु के भय से बात करती है। चूँकि यह कुछ भी भौतिक नहीं माँगती, हर पृष्ठभूमि के लोग इसे सच्चे मन से बोल पाते हैं।
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