Bhakti Arohan
ॐ

श्री यमुना चालीसा – जै जै जै यमुना महारानी

यमुना को कालिन्दी, सूर्यसुता और कृष्ण की पटरानी के रूप में गाने वाली ब्रज की चालीसा — कृष्ण को पाने के लिए उनका तप, सोलह श्रृंगार वाला रूप, उनके जल का स्नान और आचमन जो भवसागर से पार करता है, और पुष्टिमार्ग की यह मान्यता कि उनकी कृपा से जीव का कृष्ण से ब्रह्म-सम्बन्ध होता है।

श्री यमुना चालीसा – जै जै जै यमुना महारानी

मूल पाठ

॥ दोहा ॥ प्रियसंग क्रीड़ा करत नित, सुखनिधि वेद को सार । दरस परस ते पाप मिटे, श्रीकृष्ण प्राण आधार ॥ यमुना पावन विमल सुजस, भक्तिसकल रस खानि । शेष महेश वदंन करत, महिमा न जाय बखानि ॥ पूजित सुरासुर मुकुन्द प्रिया, सेवहि सकल नर-नार । प्रकटी मुक्ति हेतु जग, सेवहि उतरहि पार ॥ बंदि चरण कर जोरी कहो, सुनियों मातु पुकार । भक्ति चरण चित्त देई के, कीजै भव ते पार ॥ ॥ चौपाई ॥ जै जै जै यमुना महारानी । जय कालिन्दि कृष्ण पटरानी ॥१॥ रूप अनूप शोभा छवि न्यारी । माधव-प्रिया ब्रज शोभा भारी ॥२॥ भुवन बसी घोर तप कीन्हा । पूर्ण मनोरथ मुरारी कीन्हा ॥३॥ निज अर्धांगी तुम्ही अपनायों । सावँरो श्याम पति प्रिय पायो ॥४॥ रूप अलौकिक अद्भूत ज्योति । नीर रेणू दमकत ज्यूँ मोती ॥५॥ सूर्यसुता श्यामल सब अंगा । कोटिचन्द्र ध्युति कान्ति अभंगा ॥६॥ आश्रय ब्रजाधिश्वर लीन्हा । गोकुल बसी शुचि भक्तन कीन्हा ॥७॥ कृष्ण नन्द घर गोकुल आयों । चरण वन्दि करि दर्शन पायों ॥८॥ सोलह श्रृंगार भुज कंकण सोहे । कोटि काम लाजहि मन मोहें ॥९॥ कृष्णवेश नथ मोती राजत । नुपूर घुंघरू चरण में बाजत ॥१०॥ मणि माणक मुक्ता छवि नीकी । मोहनी रूप सब उपमा फिकी ॥११॥ मन्द चलहि प्रिय-प्रीतम प्यारी । रीझहि श्याम प्रिय प्रिया निहारी ॥१२॥ मोहन बस करि हृदय विराजत । बिनु प्रीतम क्षण चैन न पावत ॥१३॥ मुरलीधर जब मुरली बजावैं । संग केलि कर आनन्द पावैं ॥१४॥ मोर हंस कोकिल नित खेलत । जलखग कूजत मृदुबानी बोलत ॥१५॥ जा पर कृपा दृष्टि बरसावें । प्रेम को भेद सोई जन पावें ॥१६॥ नाम यमुना जब मुख पे आवें । सबहि अमगंल देखि टरि जावें ॥१७॥ भजे नाम यमुना अमृत रस । रहे साँवरो सदा ताहि बस ॥१८॥ करूणामयी सकल रसखानि । सुर नर मुनि बंदहि सब ज्ञानी ॥१९॥ भूतल प्रकटी अवतार जब लीन्हो । उध्दार सभी भक्तन को किन्हो ॥२०॥ शेष गिरा श्रुति पार न पावत । योगी जति मुनी ध्यान लगावत ॥२१॥ दंड प्रणाम जे आचमन करहि । नासहि अघ भवसिंधु तरहि ॥२२॥ भाव भक्ति से नीर न्हावें । देव सकल तेहि भाग्य सरावें ॥२३॥ करि ब्रज वास निरंतर ध्यावहि । परमानंद परम पद पावहि ॥२४॥ संत मुनिजन मज्जन करहि । नव भक्तिरस निज उर भरहि ॥२५॥ पूजा नेम चरण अनुरागी । होई अनुग्रह दरश बड़भागी ॥२६॥ दीपदान करि आरती करहि । अन्तर सुख मन निर्मल रहहि ॥२७॥ कीरति विशद विनय करी गावत । सिध्दि अलौकिक भक्ति पावत ॥२८॥ बड़े प्रेम श्रीयमुना पद गावें । मोहन सन्मुख सुनन को आवें ॥२९॥ आतुर होय शरणागत आवें । कृपाकरी ताहि बेगि अपनावें ॥३०॥ ममतामयी सब जानहि मन की । भव पीड़ा हरहि निज जन की ॥३१॥ शरण प्रतिपाल प्रिय कुंजेश्वरी । ब्रज उपमा प्रीतम प्राणेश्वरी ॥३२॥ श्रीजी यमुना कृपा जब होई । ब्रह्म सम्बन्ध जीव को होई ॥३३॥ पुष्टिमार्गी नित महिमा गावैं । कृष्ण चरण नित भक्ति दृढावैं ॥३४॥ नमो नमो श्री यमुने महारानी । नमो नमो श्रीपति पटरानी ॥३५॥ नमो नमो यमुने सुख करनी । नमो नमो यमुने दु:ख हरनी ॥३६॥ नमो कृष्णायैं सकल गुणखानी । श्रीहरिप्रिया निकुंज निवासिनी ॥३७॥ करूणामयी अब कृपा कीजैं । फदंकाटी मोहि शरण मे लीजैं ॥३८॥ जो यमुना चालिसा नित गावैं । कृपा प्रसाद ते सब सुख पावैं ॥३९॥ ज्ञान भक्ति धन कीर्ति पावहि । अंत समय श्रीधाम ते जावहि ॥४०॥ ॥ दोहा ॥ भज चरन चित सुख करन, हरन त्रिविध भव त्रास । भक्ति पाई आनंद रमन, कृपा दृष्टि ब्रज वास ॥ यमुना चालिसा नित नेम ते, पाठ करे मन लाय । कृष्ण चरण रति भक्ति दृढ, भव बाधा मिट जाय ॥

लिप्यंतरण

Doha Priyasang Kreeda Karat Nit, Sukhnidhi Ved Ko Saar, Daras Paras Te Paap Mite, Shri Krishna Praan Aadhaar. Yamuna Paavan Vimal Sujas, Bhakti Sakal Ras Khaani, Shesh Mahesh Vandan Karat, Mahima Na Jaay Bakhaani. Poojit Suraasur Mukund Priya, Sevahi Sakal Nar-Naar, Prakati Mukti Hetu Jag, Sevahi Utarahi Paar. Bandi Charan Kar Jori Kaho, Suniyon Maatu Pukaar, Bhakti Charan Chitta Dei Ke, Keejai Bhav Te Paar. Chaupai Jai Jai Jai Yamuna Mahaaraani, Jay Kaalindi Krishna Patraani (1) Roop Anoop Shobha Chhavi Nyaari, Maadhav-Priya Braj Shobha Bhaari (2) Bhuvan Basi Ghor Tap Keenha, Poorna Manorath Muraari Keenha (3) Nij Ardhaangi Tumhi Apnaayon, Saavanro Shyaam Pati Priya Paayo (4) Roop Alaukik Adbhut Jyoti, Neer Renu Damkat Jyun Moti (5) Sooryasuta Shyaamal Sab Anga, Koti Chandra Dhyuti Kaanti Abhanga (6) Aashray Brajaadhishvar Leenha, Gokul Basi Shuchi Bhaktan Keenha (7) Krishna Nand Ghar Gokul Aayon, Charan Vandi Kari Darshan Paayon (8) Solah Shringaar Bhuj Kankan Sohe, Koti Kaam Laajahi Man Mohen (9) Krishnavesh Nath Moti Raajat, Nupoor Ghunghru Charan Mein Baajat (10) Mani Maanak Mukta Chhavi Neeki, Mohini Roop Sab Upma Phiki (11) Mand Chalahi Priya-Preetam Pyaari, Reejhahi Shyaam Priya Priya Nihaari (12) Mohan Bas Kari Hriday Viraajat, Binu Preetam Kshan Chain Na Paavat (13) Murleedhar Jab Murli Bajaavain, Sang Keli Kar Aanand Paavain (14) Mor Hans Kokil Nit Khelat, Jalkhag Koojat Mridubaani Bolat (15) Jaa Par Kripa Drishti Barsaaven, Prem Ko Bhed Soi Jan Paaven (16) Naam Yamuna Jab Mukh Pe Aaven, Sabahi Amangal Dekhi Tari Jaaven (17) Bhaje Naam Yamuna Amrit Ras, Rahe Saanvro Sada Taahi Bas (18) Karunamayi Sakal Raskhaani, Sur Nar Muni Bandahi Sab Jnaani (19) Bhootal Prakati Avtaar Jab Leenho, Uddhaar Sabhi Bhaktan Ko Kinho (20) Shesh Gira Shruti Paar Na Paavat, Yogi Jati Muni Dhyaan Lagaavat (21) Dand Pranaam Je Aachman Karahi, Naasahi Agh Bhavsindhu Tarahi (22) Bhaav Bhakti Se Neer Nhaaven, Dev Sakal Tehi Bhaagya Saraaven (23) Kari Braj Vaas Nirantar Dhyaavahi, Parmaanand Param Pad Paavahi (24) Sant Munijan Majjan Karahi, Nav Bhaktiras Nij Ur Bharahi (25) Pooja Nem Charan Anuraagi, Hoi Anugrah Darash Badbhaagi (26) Deepdaan Kari Aarti Karahi, Antar Sukh Man Nirmal Rahahi (27) Keerti Vishad Vinay Kari Gaavat, Siddhi Alaukik Bhakti Paavat (28) Bade Prem Shri Yamuna Pad Gaaven, Mohan Sanmukh Sunan Ko Aaven (29) Aatur Hoy Sharnaagat Aaven, Kripa Kari Taahi Begi Apnaaven (30) Mamtamayi Sab Jaanahi Man Ki, Bhav Peeda Harahi Nij Jan Ki (31) Sharan Pratipaal Priya Kunjeshvari, Braj Upma Preetam Praaneshvari (32) Shriji Yamuna Kripa Jab Hoi, Brahma Sambandh Jeev Ko Hoi (33) Pushtimaargi Nit Mahima Gaavain, Krishna Charan Nit Bhakti Dridhaavain (34) Namo Namo Shri Yamune Mahaaraani, Namo Namo Shripati Patraani (35) Namo Namo Yamune Sukh Karni, Namo Namo Yamune Dukh Harni (36) Namo Krishnaayain Sakal Gunkhaani, Shri Haripriya Nikunj Nivaasini (37) Karunamayi Ab Kripa Keejain, Phand Kaati Mohi Sharan Me Leejain (38) Jo Yamuna Chalisa Nit Gaavain, Kripa Prasaad Te Sab Sukh Paavain (39) Jnaan Bhakti Dhan Keerti Paavahi, Ant Samay Shridhaam Te Jaavahi (40) Doha Bhaj Charan Chit Sukh Karan, Haran Trividh Bhav Traas, Bhakti Paai Aanand Raman, Kripa Drishti Braj Vaas. Yamuna Chalisa Nit Nem Te, Paath Kare Man Laay, Krishna Charan Rati Bhakti Dridh, Bhav Baadha Mit Jaay.

यमुना — नदी जो देवी हैं

यमुना गढ़वाल हिमालय में यमुनोत्री से निकलती हैं और दिल्ली, वृंदावन, मथुरा और आगरा से होकर प्रयाग में गंगा से मिलती हैं। पुराणों में वे सूर्य की पुत्री और मृत्यु के देवता यम की बहन हैं — इसीलिए उनके जल में स्नान यम-भय से मुक्त करने वाला माना जाता है, और यम द्वितीया (भाई दूज) को भाई-बहन मथुरा के विश्राम घाट पर साथ स्नान करते हैं। उद्गम-स्थल कलिंद पर्वत के नाम पर उन्हें कालिन्दी भी कहते हैं, और भागवत पुराण कालिन्दी को कृष्ण की आठ प्रमुख पटरानियों में गिनता है: वे कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए अपने ही तट पर तप कर रही थीं।

ब्रज में, और विशेषकर वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित पुष्टिमार्ग में, वे "श्री यमुनाजी" हैं — केवल पवित्र नदी नहीं, बल्कि कृष्ण की प्रिया, जो जीवों को उन तक पहुँचाती हैं। वल्लभाचार्य का अपना यमुनाष्टकम् उनकी इसी रूप में स्तुति करता है, और यह चालीसा उसी परंपरा से आती है।

रचयिता

चालीसा में कवि की कोई छाप नहीं है, और प्रकाशित स्रोत रचयिता या रचनाकाल नहीं बताते। इसकी भाषा पर ब्रज का गहरा रंग है (करहि, पावहि, सांवरो, न्हावें), और चौपाई 34 अपने समुदाय का नाम स्वयं लेती है: "पुष्टिमार्गी नित महिमा गावैं"। इसे ब्रज और पुष्टिमार्ग परंपरा का भक्ति-स्तोत्र समझना ही ठीक है।

चालीसा क्या कहती है

  • आरंभिक दोहे: यमुना "प्रिय संग नित क्रीड़ा करती हैं", वेदों का सार और श्रीकृष्ण के प्राणों का आधार हैं; शेष और महेश उनकी वंदना करते हैं; सुर-असुर "मुकुन्द प्रिया" की पूजा करते हैं, और वे जगत में मुक्ति के लिए प्रकट हुई हैं।
  • चौपाई 1–8 — कृष्ण की पटरानी: कालिन्दी, कृष्ण की पटरानी, ने घोर तप किया और मुरारी ने उनका मनोरथ पूरा कर उन्हें अर्धांगिनी बनाया। वे सूर्यसुता हैं — सब अंग श्यामल, फिर भी करोड़ों चंद्रमाओं जैसी कांति; उनका नीर और रेणु मोती-सा दमकता है। उन्होंने ब्रजाधीश्वर का आश्रय लिया, गोकुल में बसीं, और जब कृष्ण नंद के घर आए तो चरण-वंदन कर दर्शन पाए।
  • चौपाई 9–16 — रूप और लीला: सोलह श्रृंगार, कंकण, मोती की नथ, घुंघरू वाले नूपुर; उनकी मंद, मनोहर चाल; मुरली बजाते और उनके संग केलि करते कृष्ण; तट पर खेलते मोर, हंस, कोकिल और कूजते जलपक्षी। जिस पर वे कृपा-दृष्टि डालती हैं, वही "प्रेम को भेद" पाता है।
  • चौपाई 17–28 — नाम और जल का प्रभाव: "यमुना" नाम मुख पर आते ही सब अमंगल टल जाते हैं और सांवरा सदा वश में रहता है; जो दंड-प्रणाम कर आचमन करते हैं, उनके पाप नष्ट होते हैं; जो भाव-भक्ति से नहाते हैं, देवता भी उनके भाग्य की सराहना करते हैं; जो ब्रज में बसकर उनका ध्यान करते हैं, वे परम पद पाते हैं। दीपदान और आरती करने से मन निर्मल रहता है।
  • चौपाई 29–34 — पुष्टिमार्ग के पद: जो प्रेम से श्रीयमुना के पद गाता है, उसे सुनने स्वयं मोहन आते हैं; वे कुंजेश्वरी हैं, ब्रज के कुंजों की स्वामिनी; और "श्रीजी यमुना कृपा जब होई, ब्रह्म सम्बन्ध जीव को होई" — ब्रह्म-सम्बन्ध पुष्टिमार्ग में जीव के कृष्ण से संबंध की दीक्षा का नाम है।
  • चौपाई 35–40 और अंतिम दोहे: "नमो नमो" का प्रणाम — श्री यमुने महारानी, श्रीपति की पटरानी, निकुंज-निवासिनी हरिप्रिया को — फंदा काटकर शरण में लेने की विनती, और यह फलश्रुति कि नित्य पाठ करने वाला ज्ञान, भक्ति, धन, कीर्ति, कृष्ण-चरणों में दृढ़ प्रीति और अंत में श्रीधाम पाता है।

कब पढ़ें

  • यमुना छठ (यमुना जयंती, चैत्र शुक्ल षष्ठी) को, जब मथुरा-वृंदावन में उनका प्राकट्योत्सव मनाया जाता है।
  • यम द्वितीया / भाई दूज पर, विशेषकर यमुना-स्नान से पहले या बाद में।
  • यमुना-स्नान के समय या संध्या को घाटों पर दीपदान करते हुए — चालीसा स्वयं दीपदान और आरती का उल्लेख करती है।
  • पुष्टिमार्ग या ब्रज परंपरा वाले घरों में कृष्ण-सेवा के साथ प्रतिदिन।

पाठ के बारे में

ऊपर दिया पाठ वैसा ही है जैसा आज तक, श्री मंदिर और वनइंडिया हिंदी ने प्रकाशित किया है। तीनों में एक-दो चंद्रबिंदु के सिवा शब्दशः समानता है, इसलिए संभवतः तीनों का स्रोत एक ही है। उस साझा पाठ में कुछ ऐसी वर्तनियाँ हैं जो टंकण की भूल लगती हैं — अमगंल (अमंगल, चौपाई 17), फदंकाटी (फंद काटि, चौपाई 38) और सिध्दि / उध्दार। अनुमान से सुधारने के बजाय हमने पाठ ठीक वैसा ही रखा है जैसा प्रकाशित है; लिप्यंतरण में इन शब्दों को उनके अभिप्रेत रूप में पढ़ा गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यमुना को कृष्ण की पटरानी क्यों कहा जाता है?

भागवत पुराण में कालिन्दी — नदी-देवी यमुना — ने कृष्ण को पाने के लिए तप किया और उनकी आठ प्रमुख पटरानियों में से एक बनीं। चालीसा इसी से आरंभ होती है: "जय कालिन्दि कृष्ण पटरानी", और चौपाई 3–4 उनके तप और कृष्ण के उन्हें अपनाने का वर्णन करती हैं।

यमुना चालीसा किसने लिखी?

पाठ में या प्रकाशित स्रोतों में किसी रचयिता का नाम नहीं है। इसकी भाषा और पुष्टिमार्ग व ब्रह्म-सम्बन्ध के उल्लेख इसे ब्रज की भक्ति-परंपरा की रचना बताते हैं।

चौपाई 33 में आया ब्रह्म-सम्बन्ध क्या है?

पुष्टिमार्ग में ब्रह्म-सम्बन्ध वह दीक्षा है जिसमें भक्त स्वयं को और अपना सब कुछ कृष्ण को समर्पित करता है। चालीसा कहती है कि यह संबंध श्रीजी (कृष्ण) और यमुना की कृपा से जीव को मिलता है।

यमुना जयंती कब होती है?

यमुना छठ या यमुना जयंती चैत्र शुक्ल षष्ठी को होती है — चैत्र के शुक्ल पक्ष का छठा दिन, प्रायः मार्च या अप्रैल में। यह मुख्यतः मथुरा और वृंदावन में मनाई जाती है।

क्या यमुना का भाई दूज से संबंध है?

हाँ। यमुना यम की बहन हैं। मान्यता है कि यम द्वितीया को उन्होंने अपने भाई को घर बुलाकर भोजन कराया, और इस दिन भाई-बहन मथुरा के विश्राम घाट पर साथ-साथ यमुना-स्नान करते हैं।

क्या नदी से दूर रहकर यमुना चालीसा पढ़ सकते हैं?

हाँ। प्रायः इसे घर पर यमुनाजी के चित्र के सामने या कृष्ण-पूजा के साथ पढ़ा जाता है। कुछ भक्त आचमन या छिड़कने के लिए थोड़ा यमुना-जल रखते हैं, जैसा चौपाई 22 में आता है।

यह यमुनाष्टकम् से कैसे अलग है?

यमुनाष्टकम् वल्लभाचार्य का आठ श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र है। चालीसा दोहा-चौपाई शैली का लंबा हिंदी गीत है। दोनों यमुना को कृष्ण-प्रिया के रूप में गाते हैं।

कोई त्रुटि दिखे?

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