मूल पाठ
वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड परायी जाणे रे । पर दुःखे उपकार करे तो ये, मन अभिमान न आणे रे ॥ वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड परायी जाणे रे । सकल लोकमां सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे । वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे ॥ वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड परायी जाणे रे । समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे । जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे ॥ वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड परायी जाणे रे । मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे । रामनाम शुं ताली रे लागी, सकल तीरथ तेना तनमां रे ॥ वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड परायी जाणे रे । वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे । भणे नरसैयॊ तेनुं दरसन करतां, कुल एकोतेर तार्या रे ॥
लिप्यंतरण
Vaishnav Jan To Tene Kahiye Je Pid Parayi Jane Re Par Duhkhe Upakar Kare To Ye Man Abhiman Na Ane Re. Vaishnav Jan To Tene Kahiye Je Pid Parayi Jane Re Sakal Lokaman Sahune Vande Ninda Na Kare Keni Re Vach Kachh Man Nishchal Rakhe Dhan Dhan Janani Teni Re. Vaishnav Jan To Tene Kahiye Je Pid Parayi Jane Re Samadrishti Ne Trishna Tyagi Parastri Jene Mat Re Jihva Thaki Asatya Na Bole Paradhan Nav Jhale Hath Re. Vaishnav Jan To Tene Kahiye Je Pid Parayi Jane Re Moh Maya Vyape Nahi Jene Drirh Vairagya Jena Manaman Re Ramanam Shun Tali Re Lagi Sakal Tirath Tena Tanaman Re. Vaishnav Jan To Tene Kahiye Je Pid Parayi Jane Re Vanalobhi Ne Kapatarahit Chhe Kam Krodh Nivarya Re Bhane Narasaiyaॊ Tenun Darasan Karatan Kul Ekoter Tarya Re.
सच्चा वैष्णव कौन?
पहली पंक्ति प्रश्न पूछती है और तुरंत उत्तर देती है: "वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड परायी जाणे रे" — "सच्चा वैष्णव उसे कहो जो पराई पीड़ा जाने।" वह नहीं जो तिलक लगाए, व्रत रखे या कर्मकांड जाने, बल्कि वह जो दूसरे के दुःख को अपना समझे। भजन की बाकी हर बात इसी से निकलती है।
इसे 15वीं शताब्दी में जूनागढ़ के नरसिंह मेहता ने गुजराती में लिखा — गुजराती साहित्य के आदि-कवि, कृष्ण भक्त जिन्होंने सामान्य लोगों की भाषा में गाया और निर्धनों के बीच गाने के कारण अपनी ही जाति से बहिष्कृत हुए। यहाँ दिया पाठ प्रचलित रूप से गाया जाने वाला गुजराती मूल है।
हर पद क्या कहता है
- बिना अभिमान सहायता: वह दुखियों का उपकार करता है, और सहायता करके भी मन में अभिमान नहीं आने देता।
- सबका सम्मान: वह संसार में सबको वंदन करता है और किसी की निंदा नहीं करता; वाणी, कर्म और मन को निश्चल रखता है — "धन्य है उसकी जननी।"
- समदृष्टि: वह सबको समान देखता है और तृष्णा त्याग चुका है; पराई स्त्री को माता मानता है; जीभ से असत्य नहीं बोलता; पराए धन को हाथ नहीं लगाता।
- वैराग्य और नाम: मोह-माया उसे नहीं छूती; मन में दृढ़ वैराग्य है; राम नाम में लीन है — "सकल तीरथ तेना तनमां" — सारे तीर्थ उसके शरीर में हैं।
- लोभ से मुक्त: लोभ और कपट से रहित, काम-क्रोध पर विजय पाने वाला। "नरसैयो कहते हैं: ऐसे व्यक्ति के दर्शन से इकहत्तर पीढ़ियाँ तर जाती हैं।"
भजन में कहीं मंदिर, मूर्ति या कर्मकांड का उल्लेख नहीं है। इसकी भक्ति पूरी तरह आचरण की है — इसीलिए यह किसी एक संप्रदाय से बहुत आगे तक पहुँचा।
गांधी जी का प्रिय भजन
महात्मा गांधी ने इसे साबरमती आश्रम की दैनिक प्रार्थना में रखा, और यह स्वतंत्रता आंदोलन और सेवा को धर्म मानने के उनके विचार से जुड़ गया। आज भी यह प्रार्थना सभाओं में, गांधी जयंती और 30 जनवरी को, और शांति व सद्भाव के आयोजनों में गाया जाता है।
कब गाएँ
- सुबह या शाम की प्रार्थना, विद्यालय की प्रार्थना सभा और सत्संग में।
- गांधी जयंती (2 अक्टूबर) और शहीद दिवस (30 जनवरी) पर।
- जब भी यह याद करना हो कि भक्ति दैनिक आचरण में कैसी दिखती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वैष्णव जन तो तेने कहिये किसने लिखा?
नरसिंह मेहता (नरसी मेहता) ने, जूनागढ़ (गुजरात) के 15वीं शताब्दी के कृष्ण-भक्त कवि।
"वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड परायी जाणे रे" का अर्थ क्या है?
"सच्चा वैष्णव उसे कहो जो दूसरों की पीड़ा को समझे।"
यह भजन किस भाषा में है?
गुजराती में। इसके हिंदी रूप भी प्रचलित हैं, पर गांधी जी जो गाते थे वह गुजराती मूल है।
यह महात्मा गांधी से क्यों जुड़ा है?
यह उनके आश्रम की दैनिक प्रार्थना का अंग और उनका प्रिय भजन था; यह सेवा को धर्म मानने के उनके विचार का प्रतीक बन गया।
"कुल एकोतेर तार्या" का क्या अर्थ है?
"कुल की इकहत्तर पीढ़ियाँ तर जाती हैं" — ऐसे भक्त के दर्शन का पुण्य कितना बड़ा है, यह कहने का कवि का तरीका।
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