Bhakti Arohan
ॐ

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो – मीराबाई

मीराबाई का आनंद से भरा पद, उस एक धन के बारे में जिसे न चोर लूट सकता है न खर्च घटा सकता है — नाम का रत्न, जो उन्हें सतगुरु ने दिया। संपूर्ण पाठ, पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ, मीरा के गुरु कौन थे, और यह भजन राजस्थान से हर घर तक कैसे पहुँचा।

मूल पाठ

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो । वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु, किरपा करी अपनायो ॥ जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो । खरचै न खूटै चोर न लूटै, दिन दिन बढ़त सवायो ॥ सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो । मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, हरख हरख जस गायो ॥

लिप्यंतरण

Payo Ji Maine Ram Ratan Dhan Payo. Vastu Amolik Di Mere Satguru, Kirpa Kari Apnayo. Janam Janam Ki Poonji Pai, Jag Mein Sabhi Khovayo. Kharchai Na Khootai Chor Na Lootai, Din Din Badhat Savayo. Sat Ki Naav Khevatiya Satguru, Bhavsagar Tar Aayo. Mira Ke Prabhu Giridhar Nagar, Harakh Harakh Jas Gayo.

वह रत्न जो बढ़ता ही जाता है

"मैंने राम-रत्न रूपी धन पा लिया।" छह छोटी पंक्तियों में मीराबाई व्यापारी के बही-खाते की भाषा — पूँजी, खर्च, चोरी, ब्याज — को कृपा के गीत में बदल देती हैं। बाकी सब खर्च हो सकता है, खो सकता है, लुट सकता है; यह एक धन केवल बढ़ता है। भजन मीरा के पदों की राजस्थानी-रंगी हिंदी में है, और गाते समय पहली पंक्ति हर दोहे के बाद टेक के रूप में दोहराई जाती है।

पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ

  1. पायो जी मैंने राम रतन धन पायो — "मैंने पा लिया: राम[-नाम] रूपी रत्न का धन।"
  2. वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु, किरपा करी अपनायो — "मेरे सतगुरु ने यह अमूल्य वस्तु दी; कृपा करके मुझे अपना लिया।"
  3. जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो — "जन्म-जन्म की पूँजी मिल गई" — और उसके लिए संसार का सब कुछ छूट गया।
  4. खरचै न खूटै, चोर न लूटै, दिन दिन बढ़त सवायो — "खर्च करने से घटता नहीं, चोर लूट नहीं सकता; दिन-दिन सवाया बढ़ता है।" सवाया, यानी सवा गुना, व्यापारी का स्थिर लाभ का शब्द है।
  5. सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो — "सत्य की नाव, सतगुरु खेवनहार — मैं भवसागर पार उतर आई।"
  6. मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, हरख हरख जस गायो — "मीरा के प्रभु गिरिधर नागर (गोवर्धनधारी कृष्ण) हैं; हर्ष से भरकर मैंने उनका यश गाया।"

राम या कृष्ण?

मीरा के इष्ट गिरिधर गोपाल कृष्ण हैं, और छाप वाली पंक्ति उन्हीं का नाम लेती है। पहली पंक्ति का "राम" संत कवियों की तरह ईश्वर के नाम के अर्थ में है — वह नाम जो गुरु देता है। इसीलिए यह भजन राम और कृष्ण दोनों के मंदिरों में समान रूप से गाया जाता है, और इसके शीर्षक का अर्थ प्रायः "प्रभु-नाम का रत्न" किया जाता है।

मीरा के सतगुरु कौन थे?

पद सतगुरु की स्तुति करता है पर उनका नाम नहीं लेता। मीरा के नाम से प्रचलित अन्य पदों में झलकती एक प्रबल परंपरा मानती है कि उन्होंने संत रविदास (रैदास) को गुरु माना। इतिहासकार इस पर बहस करते हैं कि यह कितना प्रमाणित है, पर भक्ति-परंपरा में यही सबसे व्यापक मत है।

मीराबाई संक्षेप में

मीरा 16वीं शताब्दी की, राजस्थान के मेड़ता की राजपूत राजकुमारी थीं, जिनका विवाह मेवाड़ राजघराने में हुआ, और जो बचपन से कृष्ण को ही अपना सच्चा पति मानती थीं। उनके गीतों, मेवाड़ दरबार में उनकी परीक्षाओं की कथाओं और द्वारका में उनके अंतिम वर्षों ने उन्हें भक्ति आंदोलन की सबसे प्रिय कवयित्री बना दिया। उनके नाम से हज़ारों पद गाए जाते हैं; विद्वान मानते हैं कि उनमें से कुछ ही निश्चित रूप से उनके हैं, पर यह पद परंपरा में सबसे दृढ़ता से उनका माना जाता है।

हर घर तक कैसे पहुँचा

हिंदुस्तानी संगीतकार पं. डी. वी. पलुस्कर ने 20वीं शताब्दी के मध्य में इस भजन को प्रसिद्ध किया, और लता मंगेशकर की रिकॉर्डिंग ने इसे हर घर पहुँचा दिया। यह सत्संगों, विद्यालय की प्रार्थना-सभाओं और मंदिर-कीर्तनों में गाया जाता है, और 2015 की एक हिंदी फ़िल्म का शीर्षक भी इसी से लिया गया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

"पायो जी मैंने राम रतन धन पायो" किसने लिखा?

मीराबाई ने, राजस्थान की 16वीं शताब्दी की कृष्ण-भक्त कवयित्री। अंतिम पंक्ति में उनकी छाप है: "मीरा के प्रभु गिरिधर नागर"।

"राम रतन धन" क्या है?

"राम रूपी रत्न का धन" — गुरु से मिला प्रभु-नाम, जिसे मीरा एकमात्र न खोने वाला धन कहती हैं।

"दिन दिन बढ़त सवायो" का क्या अर्थ है?

"दिन-दिन सवा गुना बढ़ता है" — सवाया व्यापारी का लाभ का शब्द है। नाम, धन के विपरीत, केवल बढ़ता है।

यह भजन राम का है या कृष्ण का?

मीरा के प्रभु कृष्ण (गिरिधर नागर) हैं; यहाँ "राम" संत-परंपरा की तरह ईश्वर के नाम के अर्थ में है। यह दोनों के लिए गाया जाता है।

इस भजन को किसने प्रसिद्ध किया?

पं. डी. वी. पलुस्कर के गायन ने इसे व्यापक रूप से प्रसिद्ध किया, और बाद में लता मंगेशकर की रिकॉर्डिंग ने इसे घर-घर का भजन बना दिया।

क्या पाठ हर जगह एक जैसा है?

छह पंक्तियाँ स्थिर हैं, बस राजस्थानी और मानक-हिंदी रूपों में वर्तनी के छोटे अंतर मिलते हैं (जैसे "मैंने" की जगह "म्हें तो", "अमोलिक" की जगह "अमोलक")।

कोई त्रुटि दिखे?

यदि आपको इस पृष्ठ पर व्याकरण, हिंदी, अंग्रेज़ी, मंत्र-पाठ या किसी भी प्रकार की त्रुटि दिखे, तो हमें बताएँ — हम 24 घंटे में उसे ठीक कर देंगे।

संबंधित सामग्री