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जीवित्पुत्रिका व्रत 2026पंचांग परम्परा और शास्त्र के अनुसार निर्णय

ज्योतिषाचार्य हरेन्द्र चौबे का निर्णय: जितिया 2026 का व्रत शनिवार 3 अक्टूबर को और पारण नवमी में, क्योंकि सप्तमी बारह दण्ड से कम है और शनिवार की अष्टमी शुद्ध है।

जीवित्पुत्रिका व्रत 2026: पंचांग परम्परा और शास्त्र के अनुसार निर्णय

जीवित्पुत्रिका व्रत 2026: निर्णय एक नज़र में

  • व्रत (शुद्ध अष्टमी): शनिवार, 3 अक्टूबर 2026
  • नहाय-खाय: शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026
  • पारण (नवमी): रविवार, 4 अक्टूबर 2026, प्रातः 05:51 बजे अष्टमी समाप्त होने के बाद
  • निर्णय का आधार: इस वर्ष सप्तमी तिथि बारह दण्ड से कम है, इसलिए शनिवार को सप्तमी से अविद्ध, अर्थात शुद्ध अष्टमी कर्मकाल में मिलेगी, और अगले दिन नवमी में पारण भी सम्भव होगा।

यह निर्णय ज्योतिषाचार्य हरेन्द्र चौबे का है। द्रिक पंचांग भी व्रत की तिथि शनिवार 3 अक्टूबर बताता है; यदि आपके परिवार में कोई भिन्न स्थानीय परंपरा है, तो अपने कुल-पुरोहित से पुष्टि कर लें।

2026 का पंचांग विवरण

नीचे का समय द्रिक पंचांग के अनुसार है। तिथि का समय पूरे भारत में एक ही होता है; सूर्योदय शहर के अनुसार बदलता है।

पटनावाराणसी
अष्टमी आरंभप्रातः 07:59, शनिवार 3 अक्टूबर
अष्टमी समाप्तप्रातः 05:51, रविवार 4 अक्टूबर
सूर्योदय, 3 अक्टूबरप्रातः 05:42प्रातः 05:51
3 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद शेष सप्तमी2 घंटे 17 मिनट (लगभग 5.7 दण्ड)2 घंटे 8 मिनट (लगभग 5.3 दण्ड)
सूर्यास्त, 3 अक्टूबरसायं 05:34सायं 05:43
सूर्योदय, 4 अक्टूबरप्रातः 05:43प्रातः 05:51
4 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद शेष अष्टमी8 मिनटलगभग 0 मिनट

इससे स्पष्ट है: शनिवार 3 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद सप्तमी केवल लगभग दो घंटे रहती है, जो बारह दण्ड (4 घंटे 48 मिनट) से बहुत कम है, और उसके बाद पूरा अपराह्न, अर्थात पूजन काल, अष्टमी में है। रविवार 4 अक्टूबर को सूर्योदय पर अष्टमी केवल कुछ मिनट रहती है, और अपराह्न नवमी में पड़ता है। इसलिए केवल उदया तिथि को मानने वाले कुछ पंचांग 4 अक्टूबर का उल्लेख करते हैं; नीचे का विवेचन बताता है कि परंपरा 3 अक्टूबर का निर्णय क्यों करती है। द्रिक पंचांग भी व्रत की तिथि शनिवार 3 अक्टूबर ही बताता है।

जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत क्या है

जीवित्पुत्रिका, जिसे जितिया या जिउतिया भी कहते हैं, आश्विन कृष्ण अष्टमी को माताओं द्वारा संतान की लंबी आयु, आरोग्य और रक्षा के लिए रखा जाने वाला व्रत है। यह विशेषकर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के मिथिला क्षेत्र में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। परंपरागत रूप से यह तीन दिन का पर्व है: सप्तमी को नहाय-खाय, अष्टमी को निर्जला व्रत, और नवमी को पारण। इस व्रत में राजा जीमूतवाहन की पूजा होती है।

जीमूतवाहन की कथा

कथा के अनुसार परोपकारी राजा जीमूतवाहन ने गरुड़ के भोजन के लिए बारी-बारी से भेजे जाने वाले नाग-बालकों की रक्षा के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने समर्पित कर दिया। उनके त्याग से प्रसन्न होकर गरुड़ ने प्राणियों को खाना छोड़ दिया, और पहले खाए गए बालकों की अस्थियों पर अमृत छिड़ककर उन्हें फिर से जीवित कर दिया। संतान की रक्षा करने वाले इसी त्याग की स्मृति में माताएँ यह व्रत रखती हैं।

पंचांग परंपरा और शास्त्र: ज्योतिषाचार्य हरेन्द्र चौबे का विवेचन

कथा चरित्र निरूपण द्वारा चरित्र निर्माण का कार्य करती है। कथा में वर्णित चरित्र (घटना) जैसे समय में प्रथम घटित होती है, वैसे समय की जब-जब पुनरावृत्ति होती है, कथा में वर्णित चरित्र कुछ अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। जब पहली बार महाराज जीमूतवाहन अपने अंगों को गरुड़ को समर्पित कर उनके द्वारा पूर्व में खाए गए बालकों की अस्थियों पर उनके द्वारा ही अमृत का छिड़काव करा जीवित करवाए, तब आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी और दूसरे दिन नवमी तिथि होने के साथ ही औदयिक अष्टमी अपराह्न काल में भी थी, जो पूजन काल था।

किसी भी व्रत का निर्णय करते समय अनेक विषयों का ध्यान रखना होता है, यथा: शुद्ध तिथि, कर्मकाल व्याप्ति और पारण। यदि हम पंचांग के द्वारा जीवित्पुत्रिका के निर्णय की परंपरा पर ध्यान दें, तो पाएँगे कि जब भी बारह दण्ड से कम सप्तमी तिथि की स्थिति रही, निर्णय किया गया। आज की अपेक्षा तब शास्त्रार्थ की प्रवृत्ति विद्वानों में अधिक थी, परंतु शास्त्रार्थ मात्र और मात्र शास्त्र-संपुष्टि के लिए ही किया जाता था। निश्चित ही यदि कथा में वर्णित "सप्तमी रहित अष्टमी" का अर्थ अष्टमी में सूर्योदय होना ही है, तो कब का पंचांग निर्णय में संशोधन कर दिया गया होता।

सप्तमी से रहित अष्टमी का अर्थ सप्तमी से अष्टमी का विद्ध न होना होता है। विद्वानों ने शास्त्र-वचन के अनुसार इसे स्वीकार किया होगा और पंचांग निर्णय की परंपरा उसी के अनुसार बनाए रखी। उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, पंचांग सप्तमी के बारह दण्ड से कम होने की स्थिति में शनिवार दिनांक 3-10-2026 को व्रत निर्णय किया है, कि सप्तमी से अविद्ध अर्थात शुद्ध अष्टमी जो कर्मकाल में मिलेगी, और नवमी में पारण भी संभव होगा।

निर्णय में प्रयुक्त शब्दों का अर्थ

  • दण्ड (घटी): समय की पारंपरिक इकाई। एक दण्ड 24 मिनट का होता है, इसलिए बारह दण्ड लगभग 4 घंटे 48 मिनट होते हैं।
  • विद्ध तिथि: जब व्रत की तिथि से पहले वाली तिथि का अंश उसी दिन में मिला हो। यहाँ "सप्तमी-विद्धा अष्टमी" वह अष्टमी है जिसमें सप्तमी का दोष माना जाए।
  • शुद्ध (अविद्ध) तिथि: वह तिथि जो पिछली तिथि से दूषित न मानी जाए।
  • औदयिक तिथि: सूर्योदय के समय जो तिथि हो।
  • कर्मकाल व्याप्ति: पूजा के निर्धारित समय (कर्मकाल) में व्रत की तिथि का रहना। जीवित्पुत्रिका में पूजन का समय अपराह्न माना गया है।
  • पारण: व्रत खोलना। जीवित्पुत्रिका का पारण नवमी तिथि में किया जाता है।

व्रत कैसे रखें

परंपरा के अनुसार सप्तमी को नहाय-खाय में स्नान के बाद सात्विक भोजन किया जाता है। अष्टमी को माताएँ प्रायः निर्जला व्रत रखती हैं, और अपराह्न में जीमूतवाहन की पूजा कर कथा सुनती हैं। नवमी को पारण किया जाता है। पूजा और पारण की विधि घर-घर की परंपरा के अनुसार थोड़ी भिन्न होती है, इसलिए अपने परिवार की रीति का पालन करें। गर्भवती, बीमार या बुज़ुर्ग महिलाएँ निर्जला व्रत से पहले चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

लेखकHarendra Chaubeyप्रकाशित5 मिनट में पढ़ें

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