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जीवित्पुत्रिका व्रत कथाजीमूतवाहन और चील-सियारिन की कथा

जितिया व्रत में सुनी जाने वाली दोनों कथाएँ: नाग माता के पुत्र को बचाने के लिए स्वयं को गरुड़ को सौंपने वाले जीमूतवाहन, और व्रत रखने वाली चील और सियारिन।

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा: जीमूतवाहन और चील-सियारिन की कथा

ये कथाएँ कहाँ से आती हैं

जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत में दो कथाएँ सुनी जाती हैं। पहली, जीमूतवाहन के बलिदान की कथा, प्राचीन और साहित्यिक है: 7वीं शताब्दी में हर्ष ने इसे संस्कृत नाटक नागानंद के रूप में लिखा, और 11वीं शताब्दी में सोमदेव ने इसे कथासरित्सागर में फिर से कहा। नीचे दी गई कथा सोमदेव के अनुसार है। दूसरी, चील और सियारिन (चिल्हो-सियारो) की कथा, बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में माताओं द्वारा कही जाने वाली लोक व्रत-कथा है। इसके विवरण गाँव-गाँव में थोड़े बदलते हैं, पर इसका मूल हर जगह एक ही है। परंपरा के अनुसार कथा सुने बिना जितिया की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती।

जीमूतवाहन: वह राजकुमार जिसने स्वयं को दे दिया

विद्याधरों के राजा जीमूतकेतु हिमालय की ढलानों पर रहते थे, और उनके पास पूर्वजों से मिला एक कल्पवृक्ष था। संतान न होने पर उन्होंने वृक्ष से पुत्र माँगा, और वृक्ष ने ऐसे पुत्र का वचन दिया जो "दान में वीर और सभी प्राणियों पर दयालु" होगा। वही पुत्र जीमूतवाहन था। युवराज बनने पर उसने पिता से वृक्ष को दूसरों के लिए उपयोग करने की अनुमति माँगी, और उसके कहने पर वृक्ष ने पृथ्वी पर इतना सोना बरसाया कि कोई निर्धन न रहा।

राज्य का इतना बड़ा खज़ाना बँटता देख ईर्ष्यालु संबंधियों ने युद्ध की तैयारी की। जीमूतवाहन ने अपने ही परिवार को मारकर सिंहासन जीतने से इनकार कर दिया। वह राज्य छोड़कर माता-पिता के साथ मलय पर्वत पर चला गया, जहाँ वह एक आश्रम में रहकर पिता की सेवा करने लगा। वहीं उसकी मित्रता सिद्ध राजकुमार मित्रावसु से हुई, और उसने उनकी बहन मलयवती से विवाह किया।

एक दिन समुद्र तट पर घूमते हुए उसने देखा कि एक युवक को एक बड़ी शिला की ओर भेजा जा रहा है, और उसकी माँ विलाप कर रही है, "हाय, मेरा बेटा!" वह युवक नाग शंखचूड़ था। उसने बताया कि बहुत पहले गरुड़ की माता विनता को नागों की माता ने दासी बना लिया था, और गरुड़ ने विष्णु से वरदान पाया था कि नाग उसका भोजन होंगे। अपनी जाति को नष्ट होने से बचाने के लिए नागराज वासुकि ने गरुड़ से समझौता किया था कि वे प्रतिदिन एक नाग इस शिला पर भेजेंगे। आज शंखचूड़ की बारी थी।

जीमूतवाहन ने उसे बचाने का निश्चय किया। शंखचूड़ ने अपनी जगह किसी और को मरने देने से इनकार किया और पास के एक शिव मंदिर में प्रार्थना करने चला गया। उसके जाते ही जीमूतवाहन ने किसी बहाने से अपने साले को घर भेज दिया और स्वयं वध्य-शिला पर लेट गया। गरुड़ झपटकर आया, उसे पकड़ा और एक पर्वत-शिखर पर ले जाकर खाने लगा, पर आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, और गरुड़ ने देखा कि उसका शिकार दुखी नहीं, बल्कि शांत और प्रसन्न है। गरुड़ के रुकने पर जीमूतवाहन ने पूछा कि भूख शांत हुए बिना वह क्यों रुक गया। तभी रक्त के निशानों के पीछे-पीछे शंखचूड़ वहाँ पहुँचा और पुकार उठा कि गरुड़ का भोजन वह है, यह राजकुमार नहीं।

यह जानकर लज्जित कि उसने दूसरे के लिए प्राण देने वाले एक राजकुमार को लगभग खा लिया था, गरुड़ प्रायश्चित के लिए अग्नि में प्रवेश करना चाहता था। जीमूतवाहन ने उससे कहा कि इसके बजाय वह प्रतिज्ञा करे कि फिर कभी नागों को नहीं खाएगा, और जिन्हें अब तक खाया है उनके लिए पश्चाताप करे। गरुड़ मान गया। सोमदेव की कथा में मलयवती की भक्ति से प्रसन्न होकर देवी गौरी ने जीमूतवाहन पर अमृत बरसाकर उसे फिर से स्वस्थ कर दिया, और गरुड़ ने स्वर्ग से अमृत लाकर पूरे तट पर छिड़का, जिससे वे सभी नाग फिर जीवित हो उठे जिनकी केवल अस्थियाँ बची थीं।

जितिया की व्रत-कथा यही कहानी अधिक सरल ढंग से कहती है: जीमूतवाहन, जिन्हें गंधर्व राजकुमार कहा गया है, शंखचूड़ की विलाप करती माँ से मिलते हैं और उसके पुत्र का लाल वस्त्र ओढ़कर शिला पर लेट जाते हैं। कुछ कथाओं में गरुड़ तब वचन देते हैं कि जो माता यह कथा सुनेगी और विधिपूर्वक व्रत रखेगी, उसकी संतान मृत्यु के मुख से भी लौट आएगी। इसीलिए जितिया पर जीमूतवाहन की पूजा होती है, प्रायः कुश से बनी एक छोटी प्रतिमा के रूप में।

चिल्हो और सियारो: चील और सियारिन की कथा

एक वन में एक चील और एक सियारिन घनिष्ठ सखियों की तरह रहती थीं, चील पेड़ पर और सियारिन उसके नीचे की झाड़ी में, और दोनों हमेशा अपना भोजन बाँटकर खाती थीं। एक वर्ष उन्होंने पास के गाँव की स्त्रियों को जितिया व्रत की तैयारी करते देखा और स्वयं भी व्रत रखने का निश्चय किया। चील ने बिना अन्न-जल के पूरी निष्ठा से व्रत रखा। सियारिन भूख सहन न कर सकी, और रात में उसने चुपके से एक मरे हुए जानवर का मांस खा लिया। चील ने उसे ऐसा करते देख लिया।

अगले जन्म में दोनों एक ही मनुष्य परिवार में बहनों के रूप में जन्मीं, चील शीलवती के रूप में और सियारिन कर्पूरावती के रूप में। एक का विवाह राजघराने में हुआ, दूसरी का एक ब्राह्मण से। शीलवती के सातों पुत्र जीवित रहे और अच्छे से बड़े हुए, पर कर्पूरावती की हर संतान जन्म के कुछ समय बाद ही मर जाती थी। ईर्ष्या में जलकर कर्पूरावती ने अपने पति से शीलवती के सातों पुत्रों के सिर कटवाकर कपड़े में लपेटकर बहन के पास भिजवा दिए। पर उस दिन शीलवती जितिया का व्रत रखे हुए थी, और पूजा के बाद जब उसने पोटली खोली, तो सिर नारियल बन चुके थे, और उसके पुत्र जीवित थे।

जब कर्पूरावती ने पूछा कि यह कैसे हुआ, तो शीलवती ने उसे पिछले जन्म की बात बताई: सियारिन ने मांस खाकर जितिया व्रत तोड़ दिया था, और चील ने उसे निभाया था। कर्पूरावती ने पश्चाताप किया और स्वयं विधिपूर्वक व्रत रखा, और समय के साथ उसकी संतानें भी जीवित रहने लगीं। कुछ गाँवों में आज भी स्त्रियाँ पूजा के लिए मिट्टी या गोबर से चील और सियारिन की छोटी प्रतिमाएँ बनाती हैं, और व्रत से एक दिन पहले चील और सियार के लिए भोजन रखती हैं।

इन कथाओं का अर्थ

दोनों कथाएँ इस व्रत के दो पक्ष बताती हैं। जीमूतवाहन की कथा किसी भी कीमत पर दूसरे की संतान की रक्षा करने की है, और इस दिन माताएँ अपनी संतान के लिए यही माँगती हैं। चील और सियारिन की कथा स्वयं व्रत के बारे में है: कि व्रत सच्चे मन से रखा जाए, और चुपके से व्रत तोड़ना कोई छोटी बात नहीं। इस वर्ष की तिथि और पंचांग निर्णय के लिए देखें ज्योतिषाचार्य हरेन्द्र चौबे का लेख जीवित्पुत्रिका व्रत 2026।

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