
बच्चे के जीवन में बहुत कम पल इतने सरल और इतने भावपूर्ण होते हैं। माता-पिता या गुरु बच्चे को गोद में बिठाते हैं, उसका नन्हा दाहिना हाथ थामते हैं, और कच्चे चावल से भरी थाली में उसकी एक उँगली से वे पहले अक्षर लिखवाते हैं जो वह जीवन में पहली बार लिखेगा। केरल में इसे विद्यारंभम, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अक्षराभ्यासम, तमिलनाडु में मुतल एळुत्तु ("पहला अक्षर"), और उत्तर भारत में विद्यारंभ संस्कार कहते हैं। सब जगह इसका सबसे प्रिय दिन विजयादशमी है।
इस लेख में 2026 की तिथि और समय, घर पर की जा सकने वाली पूरी विधि, साथ में निभाए जाने वाले माँ सरस्वती पूजा के नियम, और इस संस्कार का अर्थ दिया गया है।
विद्यारंभ मुहूर्त 2026
इस वर्ष तिथि इस पर निर्भर है कि आपका परिवार किस परंपरा को मानता है, क्योंकि दशमी तिथि एक दिन की दोपहर से शुरू होकर अगले दिन की दोपहर तक रहती है:
- दशमी तिथि: मंगलवार 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 से बुधवार 21 अक्टूबर दोपहर 2:11 तक
- केरल और कर्नाटक: विद्यारंभम बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 को है, क्योंकि उस दिन सूर्योदय के समय दशमी रहती है (मैसूरु दसरा भी 21 को है)। मंदिरों में सुबह से ही संस्कार होते हैं। दशमी समाप्त होने (दोपहर 2:11) से पहले पूरा कर लें; जितना जल्दी, उतना अच्छा।
- तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: स्थानीय पंचांगों में विजयादशमी 20 या 21 तारीख़ को हो सकती है, इसलिए अपने मंदिर से पुष्टि कर लें। 21 हो तो ऊपर वाला सुबह का समय लें; 20 हो तो नीचे वाला दोपहर का।
- दशहरे के दिन ही (मंगलवार, 20 अक्टूबर) करने वाले उत्तर भारतीय परिवार: 20 तारीख़ की सुबह अभी नवमी रहती है, इसलिए दोपहर 12:50 पर दशमी शुरू होने तक रुकें। सबसे अच्छा समय विजय मुहूर्त, दोपहर 1:59 से 2:45 है — वही समय जो शस्त्र पूजा के लिए माना जाता है।
- राहुकाल से बचें: मंगलवार को लगभग 3:00 से 4:30, और बुधवार को लगभग दोपहर 12:00 से 1:30।
ये समय नई दिल्ली के हैं; सूर्योदय पर आधारित समय शहर-शहर कुछ मिनट बदलते हैं। अगर आपके मंदिर या कुल-पुरोहित ने समय तय किया है, तो वही मानें।
विद्यारंभ संस्कार क्या है
विद्यारंभ, यानी "विद्या का आरंभ", हिंदू जीवन के पड़ावों को चिह्नित करने वाले संस्कारों में से एक है। शास्त्रीय क्रम में यह पहले मुंडन (चूड़ाकरण) के बाद और उपनयन (यज्ञोपवीत) से पहले आता है, जो कभी वैदिक अध्ययन की शुरुआत का संस्कार था। यह वह क्षण था जब औपचारिक शिक्षा से पहले बच्चे का अक्षरों से परिचय कराया जाता था। आज यह बेटे और बेटी दोनों के लिए, हर तरह के परिवारों में किया जाता है।
बच्चे प्रायः दो से पाँच वर्ष के होते हैं, अधिकतर तीन वर्ष के आसपास। कोई नियम नहीं कि बच्चे की कोई निश्चित आयु ही हो। सबसे अच्छा समय वह है जब बच्चा कुछ मिनट बैठ सके और उँगली आगे कर सके।
विजयादशमी ही क्यों?
नवरात्र के अंतिम दिन विद्या, संगीत और वाणी की देवी सरस्वती को समर्पित हैं। केरल और दक्षिण भारत में पुस्तकें, वाद्य और अपने काम के औज़ार पूजा के लिए देवी के सामने रखे जाते हैं (पूजा वैप्पु), और दशमी की सुबह वापस लिए जाने (पूजा एडुप्पु) तक उनका उपयोग नहीं होता। जिस क्षण देवी का आशीर्वाद घर की पुस्तकों में लौटता है, उसी क्षण बच्चे की पढ़ाई शुरू करना एक स्वाभाविक आरंभ है। विजयादशमी साल के सबसे शुभ दिनों में से भी है — एक अबूझ मुहूर्त, जिसके लिए अलग से गणना की ज़रूरत नहीं। उत्तर भारत में विद्यारंभ का दूसरा प्रिय दिन वसंत पंचमी है, जो स्वयं सरस्वती का पर्व है।
किन चीज़ों की ज़रूरत होगी
- माँ सरस्वती का चित्र या मूर्ति, और छोटे गणेश जी (मौली में लिपटी एक सुपारी भी चलेगी)
- घी या तेल का दीपक (केरल में पीतल का निलविळक्कु), धूप और फूल, हो सके तो सफ़ेद या पीले
- एक थाली या केले का पत्ता, जिस पर कच्चे चावल की परत हो। कुछ परिवार बारीक रेत लेते हैं।
- एक साफ़ सोने की अँगूठी, अगर आप जीभ पर लिखने की केरल परंपरा मानते हैं
- एक नई किताब, कॉपी या स्लेट, और पेन या पेंसिल
- रोली या चंदन, अक्षत, और थोड़ा शहद या मिठाई
- मार्गदर्शन करने वाले के लिए गुरुदक्षिणा: पान का पत्ता, सुपारी और एक सिक्का, या कोई छोटा उपहार
घर पर विद्यारंभ संस्कार की क्रमवार विधि
- बच्चे और स्थान को तैयार करें। बच्चे को स्नान कराकर नए या साफ़ कपड़े पहनाएँ। सरस्वती का चित्र पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके रखें, दीपक जलाएँ और उसके सामने चावल की थाली रखें।
- पहले गणेश पूजन। ॐ गं गणपतये नमः कहते हुए रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएँ, ताकि नई शुरुआत निर्विघ्न हो।
- सरस्वती पूजन। चंदन, फूल, अक्षत और मिठाई अर्पित करें। सरस्वती वंदना पढ़ें, या बस ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः का 11 या 108 बार जप करें। वंदना का पहला श्लोक:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता,
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥"जो कुंद के फूल, चंद्रमा और हिम के हार जैसी श्वेत हैं, जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमल पर विराजती हैं, और ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवता जिनकी सदा वंदना करते हैं — वे सारी जड़ता दूर करने वाली भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें।" (पूरा पाठ: सरस्वती वंदना)
- बच्चे को गुरु की गोद में बिठाएँ। मार्गदर्शक पूर्व की ओर मुख करके बैठें और बच्चा उनकी गोद में हो। परंपरा से यह पिता, दादा-दादी या नाना-नानी, कोई शिक्षक या सम्मानित बुज़ुर्ग होते हैं; माँ भी उतनी ही उपयुक्त हैं, और आज बहुत-से परिवार उन्हीं को चुनते हैं।
- जीभ पर लिखना (केरल परंपरा)। साफ़ सोने की अँगूठी से मार्गदर्शक बच्चे की जीभ पर धीरे से "हरि श्री" लिखते हैं — यह प्रार्थना कि बच्चे की वाणी और विद्या पर आशीर्वाद बना रहे। अँगूठी पर थोड़ा शहद लगाने से छोटे बच्चों के लिए यह आसान हो जाता है।
- चावल में पहले अक्षर। बच्चे की दाहिनी तर्जनी पकड़कर मार्गदर्शक चावल में पहले शब्द लिखवाते हैं और साथ-साथ ज़ोर से बोलते हैं। केरल में यह मलयालम लिपि में "ॐ हरि श्री गणपतये नमः" होता है। अन्य जगहों पर परिवार ॐ, श्री गणेशाय नमः, या ॐ नमः शिवाय अथवा ॐ नमो नारायणाय जैसा कोई मंत्र लिखवाते हैं। इसके बाद बच्चे की मातृभाषा के पहले अक्षर, प्रायः स्वर: हिंदी में अ आ इ ई।
- पुस्तक को आशीर्वाद। नई किताब या स्लेट पर रोली का तिलक करें और बच्चे से पेन से उसमें पहला निशान बनवाएँ।
- गुरुदक्षिणा। बच्चा (माता-पिता की मदद से) पान का पत्ता, सुपारी और सिक्का मार्गदर्शक को देकर उनके पैर छूता है।
- मिठाई और आरती। बच्चे को थोड़ी मिठाई खिलाएँ और आरती करें — आती हो तो जय सरस्वती माता। थाली के चावल परिवार के लिए पकाए जाते हैं या पक्षियों को खिला दिए जाते हैं, कभी फेंके नहीं जाते।
पूरा संस्कार 15 से 20 मिनट में हो जाता है। अगर बच्चा रोए या न बैठे, तो ज़बरदस्ती न करें। उसे बहलाएँ, कुछ मिनट बाद फिर कोशिश करें, या किसी परिचित व्यक्ति की गोद में बिठाएँ। यह संस्कार आनंद के साथ विद्या शुरू करने के बारे में है।
माँ सरस्वती पूजा के नियम
- पुस्तकों को पवित्र मानें। उन्हें ज़मीन पर न रखें, न लाँघें, न पैर लगाएँ। किताब गिर जाए तो उठाकर माथे से लगाएँ। यह संस्कार इसी आदत की शुरुआत है।
- पूजा में रखी पुस्तकें दशमी तक बंद रहें। दक्षिण की परंपरा में सरस्वती के सामने रखी पुस्तकें और वाद्य दशमी की सुबह वापस लिए जाने तक प्रयोग नहीं होते। विद्यारंभम ही उनका पहला उपयोग है।
- पूजा सात्विक रखें। बहुत-से परिवार संस्कार पूरा होने तक उस दिन प्याज़, लहसुन और मांसाहार से दूर रहते हैं।
- केवल साफ़ चीज़ें लें। अँगूठी धुली हुई हो, चावल नए हों, और थाली पूजा वाली हो।
- गुरु का आभार। गुरुदक्षिणा, चाहे कितनी भी छोटी हो, संस्कार का हिस्सा है। बहुत-से परिवार उसी सप्ताह बच्चे के पहले स्कूल-शिक्षक को भी छोटा उपहार देते हैं।
मंदिरों में विद्यारंभम कहाँ होता है
बहुत-से परिवार इसे मंदिर में करना पसंद करते हैं। केरल में हर साल हज़ारों बच्चों का विद्यारंभम तिरूर के तुंचन परंबु में होता है, जो मलयालम साहित्य के जनक माने जाने वाले तुंचत्तु एऴुत्तच्छन की जन्मभूमि है, और कोट्टयम के पास पनच्चिक्काड के दक्षिण मूकांबिका मंदिर जैसे सरस्वती मंदिरों में। कर्नाटक में कोल्लूर का मूकांबिका मंदिर पूरे दक्षिण से परिवारों को खींचता है। तेलंगाना में बासर का ज्ञान सरस्वती मंदिर अक्षराभ्यासम के लिए प्रसिद्ध है, ख़ासकर वसंत पंचमी और नवरात्र में। ओडिशा में यही संस्कार खड़ी छुआँ कहलाता है और मुख्य रूप से गणेश चतुर्थी और वसंत पंचमी पर होता है। उस दिन मंदिरों में बहुत भीड़ होती है, इसलिए जल्दी पहुँचें और मंदिर कार्यालय से समय पता कर लें।
इस संस्कार का अर्थ
हर विधि का एक अर्थ है। बच्चा "A for apple" से नहीं, भगवान के नाम से शुरुआत करता है, क्योंकि विद्या की शुरुआत विनम्रता से होनी चाहिए। जीवन को पोषण देने वाला अन्न, चावल, लिखने की पहली सतह बनता है, क्योंकि ज्ञान भी अन्न की तरह पोषण देने के लिए है। जीभ पर सोना यह माँगता है कि बच्चे की वाणी मूल्यवान और सच्ची हो। और हाथ थामने वाला हाथ कमरे में हर किसी को याद दिलाता है कि कोई अकेले नहीं सीखता। जैसा प्रसिद्ध वचन है, विद्या ददाति विनयम् — विद्या विनय देती है। दशहरे के दिन, जब अच्छाई अहंकार पर विजय पाती है, यह एक उचित पहला पाठ है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
2026 में विद्यारंभ का मुहूर्त क्या है?
केरल और कर्नाटक में विद्यारंभम बुधवार 21 अक्टूबर 2026 को सुबह, दशमी समाप्त होने (दोपहर 2:11) से पहले है। दशहरे (मंगलवार 20 अक्टूबर) को करने वाले उत्तर भारतीय परिवार इसे दोपहर 12:50 पर दशमी शुरू होने के बाद करें, हो सके तो विजय मुहूर्त में, दोपहर 1:59 से 2:45 (दिल्ली)।
विद्यारंभ किस उम्र में करना चाहिए?
प्रायः दो से पाँच वर्ष के बीच, अधिकतर तीन वर्ष के आसपास। ठीक उम्र से ज़्यादा ज़रूरी है कि बच्चा कुछ मिनट बैठ सके। जो बच्चे स्कूल जाने लगे हैं, उनका भी यह संस्कार हो सकता है; कभी देर नहीं होती।
बच्चे का हाथ कौन पकड़े?
परंपरा से पिता, दादा-दादी या नाना-नानी, कोई शिक्षक या सम्मानित बुज़ुर्ग। माँ, पुरोहित या परिवार जिसका सम्मान करता है ऐसा कोई भी विद्वान व्यक्ति उतना ही उपयुक्त है।
क्या विद्यारंभ बिना पुरोहित के घर पर हो सकता है?
हाँ। ऊपर दी गई घरेलू विधि अपने आप में पूर्ण है। पुरोहित या मंदिर एक विकल्प है, अनिवार्यता नहीं।
बच्चे को सबसे पहले क्या लिखवाएँ?
केरल में "ॐ हरि श्री गणपतये नमः"। हिंदी भाषी घरों में ॐ या "श्री गणेशाय नमः", और उसके बाद पहले स्वर — अ आ इ ई। जो परिवार शिव या विष्णु का मंत्र पसंद करते हैं, वे ॐ नमः शिवाय या ॐ नमो नारायणाय लिखवा सकते हैं।
बाद में चावल का क्या करें?
उसे प्रसाद माना जाता है। परिवार के लिए पका लें, घर के चावल में मिला दें, या पक्षियों को खिला दें। फेंकें नहीं।
विजयादशमी छूट गई। क्या कोई और अच्छा दिन है?
हाँ। वसंत पंचमी विद्यारंभ का दूसरा बड़ा दिन है, ख़ासकर उत्तर भारत में। कुछ परिवार गुरु पूर्णिमा भी चुनते हैं, और पुरोहित साल की अन्य तिथियों में भी विद्यारंभ मुहूर्त निकाल सकते हैं।
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