
दशहरा 2026: शमी और अपराजिता पूजा का मुहूर्त
- विजयादशमी: मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
- दशमी तिथि: 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 से 21 अक्टूबर दोपहर 2:11 तक
- अपराजिता पूजा का समय (अपराह्न काल): दोपहर 1:14 से 3:30 तक
- विजय मुहूर्त: दोपहर 1:59 से 2:45 तक
ये समय नई दिल्ली के लिए हैं; अन्य शहरों में सूर्योदय-सूर्यास्त के अनुसार कुछ मिनट का अंतर होगा, इसलिए अपने शहर का पंचांग अवश्य देखें। बंगाल में विजयादशमी (दुर्गा विसर्जन) अगले दिन, बुधवार 21 अक्टूबर को मनाई जाएगी। नवरात्र की पूरी तिथियों के लिए देखें शारदीय नवरात्र 2026।
शास्त्रीय परंपरा में विजयादशमी के तीन विशेष कर्म बताए गए हैं — अपराजिता पूजन, शमी पूजन और सीमोल्लंघन (गाँव या नगर की सीमा पार करना) — और ये तीनों अपराह्न काल में किए जाते हैं, क्योंकि दशमी का यही भाग "विजय" का समय माना गया है। बहुत-से परिवार शमी पूजन संध्या (प्रदोष काल) में भी करते हैं; दोनों परंपराएँ प्रचलित हैं।
महाभारत कथा: शमी वृक्ष में छिपे पाण्डवों के शस्त्र
बारह वर्ष के वनवास के बाद पाण्डवों को एक वर्ष अज्ञातवास में बिताना था — यदि इस वर्ष वे पहचाने जाते, तो फिर से बारह वर्ष का वनवास होता। उन्होंने राजा विराट के नगर में वेश बदलकर रहने का निश्चय किया। पर समस्या थी उनके अस्त्र-शस्त्र: अर्जुन का गाण्डीव धनुष, भीम की गदा, अक्षय तूणीर — इन्हें लेकर नगर में जाते तो तुरंत पहचान लिए जाते।
महाभारत के विराट पर्व के अनुसार अर्जुन ने नगर के बाहर श्मशान के पास एक ऊँचे, घने शमी वृक्ष को चुना — ऐसा एकांत स्थान जहाँ कोई आता-जाता न था। नकुल ने वृक्ष पर चढ़कर सारे शस्त्र उसकी डालियों में कसकर बाँध दिए, और लोग वहाँ न आएँ, इसलिए पाण्डवों ने उसी वृक्ष पर एक शव भी बाँध दिया।
अज्ञातवास के अंतिम दिनों में जब कौरवों ने विराट की गायें हर लीं, तब बृहन्नला के वेश में रह रहे अर्जुन राजकुमार उत्तर के सारथी बनकर निकले। उन्होंने उत्तर से उसी शमी वृक्ष से शस्त्र उतरवाए — शव देखकर उत्तर झिझका, पर अर्जुन के कहने पर उसने गठरी खोली और दिव्य गाण्डीव देखकर चकित रह गया। वहीं अर्जुन ने अपनी और भाइयों की असली पहचान बताई, और अकेले ही कौरव सेना को परास्त कर गायें लौटा लाए।
शमी ने एक वर्ष तक पाण्डवों की शक्ति को सुरक्षित रखा, और उसी से निकले शस्त्रों से विजय मिली। इसीलिए शमी को "विजय का वृक्ष" कहा जाता है, और शमी की प्रार्थना में उसे "अर्जुनस्य धनुर्धारी" — अर्जुन का धनुष धारण करने वाली — कहा गया है। परंपरा यह भी मानती है कि श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई से पहले शमी की पूजा की थी; इसीलिए प्रार्थना में वह "रामस्य प्रियदर्शिनी" है।
अपराजिता देवी कौन हैं
अपराजिता का अर्थ है "जो कभी पराजित न हो"। विजयादशमी पर देवी दुर्गा की इसी विजयदायिनी शक्ति की पूजा होती है। मान्यता है कि श्रीराम ने लंका प्रस्थान से पहले देवी अपराजिता का पूजन किया था, और इसीलिए किसी नई यात्रा, नए काम या संघर्ष से पहले उनका आशीर्वाद लेने की परंपरा है। देवी के दोनों ओर उनकी दो सहचरी शक्तियाँ — जया और विजया — पूजी जाती हैं।
ध्यान दें: अपराजिता नाम की नीली फूलों वाली एक बेल (विष्णुकांता) भी होती है, जिसके फूल इस दिन देवी को चढ़ाए जाते हैं; पर अपराजिता पूजा मूल रूप से देवी की पूजा है, केवल पौधे की नहीं।
अपराजिता पूजा विधि (क्रमवार)
- स्थान: अपराह्न काल में घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में कोई स्वच्छ स्थान, आँगन या पूजा-घर चुनें।
- अष्टदल: स्थान को शुद्ध करके चंदन, रोली या चावल के आटे से आठ पंखुड़ियों वाला कमल (अष्टदल चक्र) बनाएँ।
- संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर अपने परिवार के कल्याण और कार्यों में विजय के लिए अपराजिता पूजन का संकल्प लें।
- आवाहन: अष्टदल के बीच में "ॐ अपराजितायै नमः" बोलकर देवी अपराजिता का आवाहन करें। उनके दाहिनी ओर "ॐ क्रियाशक्त्यै नमः" से देवी जया का, और बाईं ओर "ॐ उमायै नमः" से देवी विजया का आवाहन करें।
- पूजन: "ॐ अपराजितायै नमः", "ॐ जयायै नमः" और "ॐ विजयायै नमः" बोलते हुए तीनों देवियों को जल, रोली, अक्षत, फूल (संभव हो तो अपराजिता के नीले फूल), धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें — षोडशोपचार या यथाशक्ति पंचोपचार।
- प्रार्थना: हाथ जोड़कर यह मंत्र पढ़ें —
हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला।
अर्थ: विचित्र हार और चमकती स्वर्ण-मेखला से सुशोभित, कल्याण में रत देवी अपराजिता मुझे विजय प्रदान करें।
अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम॥ - विसर्जन: पूजा के अंत में देवी से क्षमा माँगकर विदा करें —
इमां पूजां मया देवि यथाशक्ति निवेदिताम्।
अर्थ: हे देवी, मेरी यथाशक्ति की गई इस पूजा को रक्षा के लिए स्वीकार करके अपने उत्तम धाम को पधारें।
रक्षार्थं तु समादाय व्रजस्व स्थानमुत्तमम्॥
दशहरा शमी पूजा विधि (क्रमवार)
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा की थाली तैयार करें — जल का लोटा (संभव हो तो गंगाजल मिलाकर), रोली, अक्षत, फूल, धूप, घी या तेल का दीपक, मिठाई और एक कलावा।
- शमी वृक्ष के पास जाकर उसे प्रणाम करें। पास में शमी न हो तो गमले में लगे शमी के पौधे की पूजा भी की जा सकती है।
- वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें, फिर रोली-अक्षत से तिलक करें और फूल चढ़ाएँ।
- वृक्ष के सामने दीपक जलाएँ और धूप दिखाएँ।
- परंपरा के अनुसार वृक्ष के नीचे अपने शस्त्र या कर्म के उपकरण — या उनका प्रतीक — रखें: विद्यार्थी पुस्तक-कलम, व्यापारी बही-खाता, किसान औज़ार। यही पाण्डवों के शमी में रखे शस्त्रों की स्मृति है।
- वृक्ष पर कलावा लपेटते हुए परिक्रमा करें (3 या 7 बार) और मिठाई का भोग लगाएँ।
- हाथ जोड़कर शमी की प्रार्थना करें (नीचे देखें), और अपने कार्यों में आने वाली बाधाओं के निवारण की कामना करें।
शमी पूजा का विशेष मंत्र
शमी शमयते पापं शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥
करिष्यमाणयात्रायां यथाकालं सुखं मया।
तत्र निर्विघ्नकर्त्री त्वं भव श्रीरामपूजिते॥
अर्थ: शमी पापों का शमन करती है, शमी शत्रुओं का नाश करती है। तुमने अर्जुन का धनुष धारण किया और तुम श्रीराम को प्रिय हो। हे श्रीराम द्वारा पूजित शमी, मैं जो यात्रा (या कार्य) करने जा रहा हूँ, उसमें तुम समय पर सुख देने वाली और विघ्नों को दूर करने वाली बनो।
कुछ क्षेत्रों में पहली पंक्तियाँ थोड़ी भिन्न पढ़ी जाती हैं — "शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका। धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी॥" (लाल काँटों वाली, अर्जुन के बाणों को धारण करने वाली) — भाव दोनों का एक ही है। शमी को रोज़ या शनिवार को जल देने की विधि के लिए देखें शमी जल अर्पण।
शमी की पत्तियाँ तिजोरी में रखने की परंपरा
दशहरे की पूजा के बाद शमी की कुछ पत्तियाँ घर लाकर तिजोरी, गल्ले, पर्स या पूजा-स्थान में रखने की परंपरा बहुत पुरानी है। इसके पीछे की मान्यताएँ ये हैं:
- विजय और स्थिरता का आशीर्वाद: जिस शमी ने पाण्डवों की शक्ति एक वर्ष तक सुरक्षित रखी, उसकी पत्तियाँ घर की लक्ष्मी और पूँजी की रक्षा करें — यही भाव है।
- "सोना" बाँटने की रीत: कर्नाटक में शमी (कन्नड़ में बन्नी) की पत्तियाँ विजयादशमी पर एक-दूसरे को सोने के प्रतीक के रूप में दी जाती हैं। महाराष्ट्र में यही रीत आपटा वृक्ष की पत्तियों से होती है, जिन्हें "सोना" कहा जाता है — ये दोनों अलग वृक्ष हैं।
- शनि और गणेश से संबंध: ज्योतिष में शमी शनिदेव का वृक्ष है, और इसकी पत्तियाँ गणेश जी को प्रिय हैं — इसलिए इसे विघ्न दूर करने वाला और शनि-पीड़ा शांत करने वाला माना जाता है।
कैसे रखें: वृक्ष से पत्तियाँ तोड़ें नहीं — परंपरा कहती है कि पूजा के बाद वृक्ष के नीचे स्वयं गिरी पत्तियाँ ही आशीर्वाद मानकर उठाएँ। उन्हें लाल कपड़े में लपेटकर, थोड़ा अक्षत और एक सिक्का साथ रखकर तिजोरी या पूजा-स्थान में रखें। अगले दशहरे पर पुरानी पत्तियाँ किसी पेड़ की जड़ में या बहते जल में विसर्जित करके नई रख लें।
यह एक श्रद्धा की परंपरा है, कोई गारंटी वाला उपाय नहीं — इसका असली अर्थ यह स्मरण है कि धन और सफलता धर्म और परिश्रम के साथ ही टिकते हैं।
सीमोल्लंघन और शस्त्र पूजा
अपराजिता और शमी पूजन के बाद पारंपरिक रूप से सीमोल्लंघन होता है — गाँव या मोहल्ले की सीमा तक जाकर लौटना, जो नई यात्राओं और अभियानों के आरंभ का प्रतीक है; पुराने समय में राजा इसी दिन सैन्य अभियान पर निकलते थे। इसी दिन शस्त्र पूजा (दक्षिण भारत में आयुध पूजा) भी होती है, जिसमें घर के औज़ार, वाहन और कार्य-उपकरण पूजे जाते हैं। शाम को रावण दहन होता है। दशहरे की कथा के लिए पढ़ें दशहरा कथा और पर्व की जानकारी के लिए दशहरा।
ध्यान रखने योग्य बातें
- शमी काँटेदार वृक्ष है — परिक्रमा और कलावा बाँधते समय सावधानी रखें, विशेषकर बच्चों के साथ।
- वृक्ष की डालियाँ या हरी पत्तियाँ न तोड़ें; केवल गिरी पत्तियाँ लें।
- अपराजिता पूजा अपराह्न में करें; यदि उस समय संभव न हो, तो दशमी तिथि रहते किसी शुभ चौघड़िया में करें, राहु काल से बचते हुए।
- विजयादशमी स्वयं एक अबूझ मुहूर्त है — नए काम, वाहन या विद्यारंभ के लिए इस दिन अलग मुहूर्त की आवश्यकता नहीं मानी जाती।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दशहरे पर शमी पूजा किस समय करें?
शास्त्रीय परंपरा में अपराह्न काल (2026 में नई दिल्ली के लिए दोपहर 1:14 से 3:30) सबसे श्रेष्ठ है; बहुत-से परिवार संध्या के समय भी शमी पूजन करते हैं।
घर में शमी का पेड़ न हो तो क्या करें?
गमले में लगे शमी के पौधे की पूजा करें, या पास के मंदिर में लगे शमी वृक्ष के पास जाकर पूजा करें। दशहरे पर शमी का पौधा घर लाकर लगाना भी शुभ माना जाता है।
अपराजिता पूजा में कौन-सा मंत्र पढ़ें?
आवाहन के लिए "ॐ अपराजितायै नमः", जया के लिए "ॐ क्रियाशक्त्यै नमः", विजया के लिए "ॐ उमायै नमः", और प्रार्थना के लिए "हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला। अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम॥"
