एक नज़र में
- नाम और अर्थ: सुश्रुत — “भली-भाँति सुना हुआ”, यानी प्रसिद्ध और विख्यात।
- अन्य नाम: आचार्य सुश्रुत। जो विद्वान मूल लेखक और बाद के संशोधकों में भेद करते हैं, वे मूल लेखक को कभी-कभी “वृद्ध सुश्रुत” कहते हैं।
- श्रेणी: आयुर्वेदाचार्य; आयुर्वेद की शल्य-परम्परा के प्रवर्तक।
- पिता: महाभारत के अनुशासनपर्व में महर्षि विश्वामित्र के पुत्रों की लम्बी सूची में एक सुश्रुत का नाम है। अनुवादक कुंजलाल भिषग्रत्न (1907) ने इन्हें वही सुश्रुत माना। संहिता स्वयं उनके माता-पिता की चर्चा नहीं करती।
- माता: पारम्परिक स्रोतों में उल्लेख नहीं मिलता।
- पत्नी: पारम्परिक स्रोतों में उल्लेख नहीं मिलता।
- गुरु: काशीराज दिवोदास, जिन्हें दिव्य वैद्य भगवान धन्वन्तरि का अवतार माना जाता है।
- सहपाठी: औपधेनव, वैतरण, औरभ्र, पौष्कलावत, करवीर्य और गोपुररक्षित। इनमें से कई के नाम से भी शल्य-ग्रन्थ बताए जाते हैं।
- वंश / गोत्र: यदि महाभारत वाली पहचान मानी जाए, तो विश्वामित्र का कुल।
- काल: अनिश्चित। पुराने लेखकों ने लगभग 600 ई.पू. सुझाया था। वर्तमान विद्वत्ता, जिसे जी. जे. म्यूलेनबेल्ड ने संकलित किया है, संहिता को कई परतों वाला ग्रन्थ मानती है, जो ईसा-पूर्व अन्तिम शताब्दियों में आरम्भ होकर बाद में पूरा हुआ, और जिसमें उत्तरतन्त्र किसी परवर्ती संशोधक ने जोड़ा।
- सम्बद्ध स्थान: काशी (वाराणसी), जहाँ दिवोदास ने शिक्षा दी।
- प्रमुख कृति: सुश्रुत संहिता: पाँच स्थान (120 अध्याय) और उत्तरतन्त्र (66 अध्याय), कुल 186 अध्याय।
- किसलिए प्रसिद्ध: शल्य-चिकित्सा, विशेषकर नासा-सन्धान (नाक का पुनर्निर्माण), शल्य-उपकरणों का वर्गीकरण, और व्यावहारिक शल्य-प्रशिक्षण।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
स्रोत सुश्रुत के व्यक्तिगत जीवन के बारे में कम और उनके गुरु के बारे में बहुत कुछ बताते हैं। सुश्रुत संहिता का आरम्भ काशी में होता है। काशीराज दिवोदास, जिन्हें मनुष्य-रूप में स्वयं भगवान धन्वन्तरि माना जाता है, अपने आश्रम में ऋषियों के बीच विराजमान हैं। शिष्यों का एक समूह उनके पास आता है: औपधेनव, वैतरण, औरभ्र, पौष्कलावत, करवीर्य, गोपुररक्षित, सुश्रुत और अन्य। वे कहते हैं कि रोग और चोट से पीड़ित लोगों को देखकर उन्हें दुःख होता है, और वे आयुर्वेद, विशेषकर शल्य-विद्या, सीखना चाहते हैं। दिवोदास स्वीकार करते हैं, और संहिता स्वयं को उसी उपदेश के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसे सुश्रुत ने लिपिबद्ध किया।
परिवार के बारे में एक परम्परा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। महाभारत के अनुशासनपर्व में महर्षि विश्वामित्र के दर्जनों पुत्रों के नाम हैं, जो सब “ब्रह्मज्ञान में पारंगत” बताए गए हैं, और उनमें एक सुश्रुत भी हैं। भिषग्रत्न जैसे आरम्भिक अनुवादकों ने इन सुश्रुत को शल्याचार्य सुश्रुत माना, और इसी कारण हिन्दी स्रोतों में उन्हें प्रायः विश्वामित्र-पुत्र कहा जाता है। यह परम्परागत पहचान है, प्रमाणित तथ्य नहीं, और संहिता इस पर कुछ नहीं कहती।
उपलब्धियाँ और योगदान
शल्य-चिकित्सा एक स्वतन्त्र शास्त्र
आयुर्वेद के आठ अङ्ग हैं, और सुश्रुत संहिता उनमें शल्य को सबसे पहले रखती है। सुश्रुत की दृष्टि में शल्य-चिकित्सा वहाँ शीघ्र लाभ दे सकती है जहाँ औषधियाँ नहीं दे पातीं, और इसके लिए अलग प्रशिक्षण, उपकरण और आचार आवश्यक हैं। चरक संहिता शल्य-कर्म का केवल संक्षिप्त उल्लेख करती है, जबकि सुश्रुत संहिता उसका विस्तार से वर्णन करती है। इसीलिए दोनों ग्रन्थ एक-दूसरे के पूरक हैं।
यन्त्र और शस्त्र
सूत्रस्थान के दो अध्याय उपकरणों पर हैं। सातवें अध्याय में 101 यन्त्रों का वर्णन है (कुण्ठित उपकरण, जैसे चिमटियाँ, शलाकाएँ, नलिकाएँ और योनि-मुख देखने के उपकरण), और आठवें अध्याय में 20 शस्त्रों का (धारदार उपकरण, जैसे छुरियाँ, नश्तर, कैंचियाँ और सुइयाँ)। ग्रन्थ बताता है कि हर उपकरण कैसे बनाया जाए (उत्तम लोहे और अन्य धातुओं से), उसे धार कैसे दी जाए, स्वच्छ कैसे रखा जाए, कैसे पकड़ा जाए, और कब उसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। कई चिमटियों के नाम उन पशु-पक्षियों पर रखे गए हैं जिनके जबड़े या चोंच से उनकी आकृति मिलती है।
प्रतिरूपों पर अभ्यास और शव-विच्छेदन
ग्रन्थ का एक बहुत आधुनिक-सा लगने वाला पक्ष है रोगी को छूने से पहले अभ्यास पर उसका आग्रह। विद्यार्थी चीरे का अभ्यास लौकी, कद्दू और ककड़ी पर करते हैं। वे छेदन का अभ्यास पानी या कीचड़ से भरी चमड़े की थैलियों पर, और मृत पशुओं के मूत्राशय पर करते हैं। खुरचने का अभ्यास बालों वाली खाल पर, सिलाई का कपड़े और चमड़े पर, और पट्टी बाँधने का आदमकद प्रतिरूपों पर होता है। शारीरस्थान यह भी कहता है कि जो शरीर-रचना का सच्चा ज्ञान चाहता है, वह केवल पुस्तकों पर निर्भर न रहे, बल्कि मृत शरीर का सावधानी से विच्छेदन करके उसका अध्ययन करे।
नाक का पुनर्निर्माण
प्राचीन भारत में नाक काटना एक दण्ड था, और संहिता (सूत्रस्थान, अध्याय 16) बताती है कि कटी नाक फिर कैसे बनाई जाए। शल्यचिकित्सक कटे भाग के नाप का एक पत्ता काटता है और उसे साँचे की तरह प्रयोग करके गाल से जीवित त्वचा का एक टुकड़ा उठाता है, जिसका एक सिरा जुड़ा रहता है। फिर वह कटे हुए भाग के किनारे ताज़ा करके उस त्वचा को उस पर जमा देता है। साँस का रास्ता खुला रखने के लिए नथुनों में छोटी नलिकाएँ रखी जाती हैं, और घाव पर औषधि लगाकर पट्टी बाँधी जाती है। चिकित्सा-इतिहासकार इसे पेडिकल-फ़्लैप से नासिका-पुनर्निर्माण का पहला लिखित वर्णन मानते हैं। 1794 में लन्दन की पत्रिका द जेंटलमैन्स मैगज़ीन ने बताया कि भारतीय शल्यचिकित्सक अब भी माथे की त्वचा से नाक बना रहे हैं, जो इसी परम्परा का एक रूप था। इस रिपोर्ट ने आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी को दिशा दी, और माथे वाली विधि आज भी “इण्डियन मेथड” कहलाती है।
केवल शल्य नहीं, सम्पूर्ण चिकित्सा
सुश्रुत संहिता एक सम्पूर्ण चिकित्सा-विश्वकोश है। अपने वर्तमान रूप में यह लगभग 1,120 रोगों और लगभग 700 औषधीय वनस्पतियों का वर्णन करती है, साथ ही खनिजों और पशु-उत्पादों से बनने वाले योगों का भी। इसमें शरीर-रचना (शल्य-परम्परा 300 अस्थियाँ गिनती थी, जबकि आयुर्वेद के अन्य आचार्य 360), प्रसूति, बाल-रोग, मोतियाबिन्द की शल्यक्रिया सहित नेत्र-रोग, कान-नाक-गले के रोग, अस्थिभंग और सन्धि-च्युति, व्रण (घाव) की देखभाल, तथा सर्पदंश सहित विष-चिकित्सा का विवेचन है। यह अच्छे परिचारक की भी परिभाषा देती है: जो शान्त और मधुर स्वभाव का हो, किसी की निन्दा न करे, रोगी की आवश्यकताओं पर ध्यान दे और वैद्य के निर्देशों का बिना थके पालन करे।
रचनाएँ: सुश्रुत संहिता की परतें
- मूल भाग (पाँच स्थान): सूत्रस्थान (46 अध्याय), निदानस्थान (16), शारीरस्थान (10), चिकित्सास्थान (40) और कल्पस्थान (8), कुल 120 अध्याय। कल्पस्थान विष और उनके प्रतिकार पर है।
- उत्तरतन्त्र (66 अध्याय): बाद में जोड़ा गया “उत्तर भाग”, जिसमें नेत्र और कान-नाक-गले के रोग (शालाक्य), बाल-रोग, कायचिकित्सा, भूतविद्या और एक समापन-परिशिष्ट है। पाण्डुलिपियों की पुष्पिकाएँ पूरे ग्रन्थ को “उत्तरतन्त्र सहित सुश्रुत संहिता” कहती हैं।
- प्रतिसंस्कार: परम्परा और विद्वान दोनों नागार्जुन नाम के एक संशोधक का नाम लेते हैं, जिन्हें भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान की 1952 की काल-निर्धारण समिति ने लगभग तीसरी–चौथी शताब्दी ई. में रखा। माना जाता है कि ये इसी नाम के प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक नहीं थे।
- धन्वन्तरि या दिवोदास? छपे संस्करणों में अध्याय “यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः” से शुरू होते हैं। काठमाण्डू के कैसर पुस्तकालय में सुरक्षित सबसे पुरानी पाण्डुलिपि, 878 ई. की ताड़पत्र-प्रति, के हाल के अध्ययन से पता चला है कि सबसे पुराना पाठ इस वाक्यांश के बिना उपदेश को दिवोदास का बताता है।
- टीकाएँ: डल्हण का निबन्धसंग्रह सबसे पूर्ण उपलब्ध टीका है। जेज्जट, गयदास और चक्रपाणिदत्त की पुरानी टीकाएँ केवल अंशों में बची हैं।
आज सुश्रुत क्यों पूजनीय हैं
सुश्रुत उन गिने-चुने प्राचीन भारतीय ऋषियों में हैं जिनका सम्मान आधुनिक अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों के भीतर होता है। प्लास्टिक सर्जरी के इतिहास के कारण दुनिया भर के शल्यचिकित्सक उनका नाम जानते हैं। हृदय-शल्यचिकित्सक डॉ. के. एम. चेरियन द्वारा भेंट की गई उनकी संगमरमर की प्रतिमा 2018 से मेलबर्न के रॉयल ऑस्ट्रेलेशियन कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स में स्थापित है। भारत में शल्य तन्त्र (आयुर्वेदिक शल्य-चिकित्सा) उनकी परम्परा में एक विशेषज्ञता के रूप में पढ़ाया जाता है, और उनका चित्र शल्य-संस्थानों और पाठ्य-पुस्तकों में दिखाई देता है। आठवीं शताब्दी में बग़दाद के बरमकी परिवार के संरक्षण में उनकी संहिता का अरबी अनुवाद किताब शाह शून अल-हिन्दी के नाम से हुआ, और इस तरह उनका काम भारत से बहुत दूर तक पहुँचा। भक्तों के लिए वे भगवान धन्वन्तरि की पवित्र परम्परा का भी अंग हैं, जिनकी जयन्ती दीपावली से ठीक पहले धनतेरस पर आरोग्य के पर्व के रूप में मनाई जाती है।
भिन्न परम्पराएँ और ऐतिहासिक टिप्पणी
- काल: इंटरनेट पर बार-बार दोहराया जाने वाला दावा कि सुश्रुत लगभग 600 ई.पू. में हुए, रुडोल्फ़ हर्नले (1907) से आता है। वह एक ऐसी मान्यता पर टिका था जिसे बाद की विद्वत्ता ने अस्वीकार कर दिया। ऐसी तिथियों को परम्परागत मानें, प्रमाणित नहीं।
- एक लेखक या अनेक? विद्वान अब लगभग एकमत हैं कि कई सदियों में कई हाथों ने इस ग्रन्थ को आकार दिया। “सुश्रुत” को उस सम्प्रदाय के संस्थापक आचार्य के रूप में समझना सबसे उचित है, जिसका कार्य समय के साथ बढ़ता गया।
- “शल्य-चिकित्सा के जनक”: यह उपाधि ग्रन्थ के अद्भुत विस्तार का सम्मान करती है, पर यह आधुनिक विशेषण है। ग्रन्थ स्वयं इस ज्ञान का श्रेय धन्वन्तरि और दिवोदास को देता है।
- वंश: विश्वामित्र से सम्बन्ध महाभारत की नाम-सूची और बाद की पहचान पर आधारित है, संहिता पर नहीं।
- सावधानी: प्राचीन ग्रन्थ में शल्य-क्रियाओं का वर्णन इतिहास है, निर्देश-पुस्तिका नहीं। आधुनिक शल्य-चिकित्सा केवल प्रशिक्षित शल्यचिकित्सक ही करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सुश्रुत के गुरु कौन थे?
काशी (वाराणसी) के राजा दिवोदास, जिन्हें भगवान धन्वन्तरि का अवतार माना जाता है।
सुश्रुत संहिता में कितने शल्य-उपकरणों का वर्णन है?
सूत्रस्थान के सातवें अध्याय में 101 यन्त्रों (कुण्ठित उपकरणों) का और आठवें अध्याय में 20 शस्त्रों (धारदार उपकरणों) का, कुल 121।
क्या सुश्रुत विश्वामित्र के पुत्र थे?
महाभारत विश्वामित्र के पुत्रों में एक सुश्रुत का नाम लेता है, और बहुत से परम्परागत विवरण उन्हें शल्याचार्य सुश्रुत मानते हैं। संहिता स्वयं इसकी पुष्टि नहीं करती, इसलिए इसे परम्परा के रूप में ही कहना उचित है।
चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में क्या अन्तर है?
चरक का केन्द्र कायचिकित्सा (आन्तरिक चिकित्सा) है और सुश्रुत का शल्य-चिकित्सा, यद्यपि दोनों कुछ हद तक पूरे आयुर्वेद को समेटते हैं। वाग्भट के अष्टाङ्गहृदय के साथ ये दोनों बृहत्त्रयी बनाते हैं।
