Bhakti Arohan
ॐ

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो – सूरदास

बाल कृष्ण पर सूरदास का सबसे प्रिय पद: मुँह पर माखन लगे पकड़े गए नन्हे कान्हा यशोदा के सामने अपनी निर्दोषता का तर्क देते हैं — दिन भर गायों के पीछे थे, बाँहें छींके तक पहुँचती नहीं, सखाओं ने मुँह पर लपेट दिया। इस पद के दोनों प्रसिद्ध रूप, उनका अर्थ, और उनके पीछे की वात्सल्य भक्ति।

मूल पाठ

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो । भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहिं पठायो । चार पहर बंसीबट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ॥ मैं बालक बहिंयन को छोटो, छींको किहि बिधि पायो । ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ॥ तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतिआयो । जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो ॥ यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो । सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥

लिप्यंतरण

Maiya Mori Main Nahin Makhan Khayo. Bhor Bhayo Gaiyan Ke Pachhe, Madhuvan Mohin Pathayo. Char Pahar Bansibat Bhatakyo, Sanjh Pare Ghar Aayo. Main Balak Bahinyan Ko Chhoto, Chheenko Kihi Bidhi Payo. Gval Baal Sab Bair Pare Hain, Barbas Mukh Laptayo. Tu Janani Man Ki Ati Bhori, Inke Kahe Patiayo. Jiy Tere Kachhu Bhed Upaji Hai, Jaani Parayo Jayo. Yah Lai Apni Lakuti Kamariya, Bahutahin Naach Nachayo. Surdas Tab Bihansi Jasoda, Lai Ur Kanth Lagayo.

यशोदा के आँगन में एक मुकदमा

माखन गायब है, ऊँचे लटके छींके की मटकी पर धावा बोला गया है, और नन्हे कृष्ण का मुँह सफेद लिपा है। सूरदास के इस पद में पाँच बरस का बालक छोटे वकील की तरह अपना पक्ष रखता है — और जीतता है, विश्वास से नहीं, प्रेम से। यह वात्सल्य भाव का सबसे सुंदर उदाहरण है, वह भक्ति जो ईश्वर को माता-पिता की तरह संतान मानकर प्रेम करती है, और सूरसागर की वह कविता जिससे अधिकतर लोग सूरदास को पहली बार जानते हैं।

पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ (प्रचलित गाया जाने वाला रूप)

  1. बहाना। "माँ, मैंने माखन नहीं खाया! भोर होते ही तूने मुझे गायों के पीछे मधुवन भेज दिया; चार पहर बंसीवट में भटकता रहा, साँझ होने पर घर आया।"
  2. शारीरिक तर्क। "मैं छोटा बालक हूँ, मेरी बाँहें छोटी हैं — छींका कैसे पा लेता? सारे ग्वाल-बाल मेरे बैरी हो गए हैं; उन्होंने ज़बरदस्ती मेरे मुँह पर लपेट दिया।"
  3. भावनात्मक तर्क। "माँ, तू मन की बड़ी भोली है, इनके कहने पर विश्वास कर लेती है। तेरे मन में कुछ भेद उपज आया है — तू मुझे पराया जाया समझती है।" (एक चतुर चुटकी: कृष्ण देवकी से जन्मे और यशोदा ने पाला।)
  4. बहिष्कार। "यह ले अपनी लकुटी और कमरिया — तूने बहुत नाच नचाया!" ग्वाले की लाठी और कंबली लौटाकर वे "नौकरी" छोड़ देते हैं।
  5. फ़ैसला। सूरदास कहते हैं: तब यशोदा हँस पड़ीं और उन्हें हृदय से लगा लिया।

दूसरा रूप: "ख्याल परै ये सखा सबै"

सूरसागर में माखन-चोर पर अनेक पद हैं, और इसी पहली पंक्ति वाला एक दूसरा, अधिक प्राचीन-सा लगने वाला पद भी बहुत प्रसिद्ध है और पढ़ाया जाता है। इसमें भी कृष्ण सखाओं और अपने छोटे हाथों का दोष देते हैं, फिर — कविता का सबसे सुंदर स्पर्श — चुपचाप मुँह का दही पोंछकर दोना पीठ पीछे छिपा लेते हैं। यशोदा छड़ी फेंककर उन्हें गले लगा लेती हैं, और सूरदास कहते हैं कि जो सुख यशोदा को मिला वह शिव और ब्रह्मा को भी नहीं मिला:

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ।
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो ॥
देखि तुही छींके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायो ।
हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो ॥
मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो ।
डारि सांटि मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो ॥
बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्रताप दिखायो ।
सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो ॥

दोनों गाए जाते हैं; पहला अधिकांश भजन-रिकॉर्डिंग (अनूप जलोटा सहित) में सुनाई देता है, और इस पद का एक रूप एनसीईआरटी की कक्षा 6 हिंदी में पढ़ाया जाता है।

सूरदास संक्षेप में

सूरदास (लगभग 15वीं–16वीं शताब्दी) ने गोवर्धन और गोकुल के आसपास ब्रजभाषा में गाया, और वे वल्लभाचार्य के शिष्य तथा अष्टछाप — पुष्टिमार्ग के उन आठ कवियों में, जिनके पद आज भी श्रीनाथजी की सेवा में गाए जाते हैं — सबसे प्रमुख माने जाते हैं। परंपरा उन्हें नेत्रहीन मानती है। उनका सूरसागर सबसे बढ़कर कृष्ण के बचपन की कविता है।

कब गाया जाता है

  • जन्माष्टमी और नंदोत्सव पर, और घर में बाल गोपाल (लड्डू गोपाल) की सेवा में।
  • माताओं द्वारा बच्चों को, और बच्चों के भजन कार्यक्रमों में।
  • पुष्टिमार्गीय हवेलियों में कृष्ण की बाल-लीला के अवसरों पर।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

"मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो" किसने लिखा?

भक्ति आंदोलन के ब्रजभाषा कवि सूरदास ने। अंतिम पंक्ति में उनका नाम है।

इसके दो अलग रूप क्यों हैं?

सूरदास ने माखन-चोरी पर अनेक पद लिखे, और कम से कम दो प्रसिद्ध पद इसी पंक्ति से शुरू होते हैं। दोनों एक ही दृश्य को अलग विवरणों से कहते हैं; दोनों परंपरा के प्रामाणिक अंग हैं।

"छींका" क्या होता है?

छत से लटकाई गई रस्सी की जाली, जिसमें दूध, दही और माखन जानवरों — और बच्चों — की पहुँच से दूर रखा जाता था।

"जानि परायो जायो" का क्या अर्थ है?

"मुझे पराए का जाया समझकर।" कृष्ण चुटकी लेते हैं कि यशोदा उन पर इसलिए शक करती हैं क्योंकि वे उनकी अपनी संतान नहीं — यह पंक्ति सदा मुस्कान लाती है, क्योंकि वे सचमुच देवकी से जन्मे थे।

वात्सल्य भक्ति क्या है?

वह भक्ति जो ईश्वर से माता-पिता के संतान-प्रेम के भाव से जुड़ती है। यशोदा इसका आदर्श हैं, और सूरदास इसके सबसे बड़े कवि।

"लकुटि कमरिया" का क्या अर्थ है?

ग्वाले की लाठी और छोटा कंबल — कृष्ण के काम के साधन। इन्हें लौटाने का अर्थ है "मैं छोड़ता हूँ!"

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