
मूल पाठ
त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा । त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्य राणा । नेती नेती शब्द न ये अनुमाना ॥ सुरवर मुनिजन योगी समाधी न ये ध्याना ॥ जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता । आरती ओवाळिता हरली भवचिंता ॥ सबाह्य अभ्यंतरी तू एक दत्त । अभाग्यासी कैची कळेल हि मात ॥ पराही परतली तेथे कैचा हेत । जन्ममरणाचाही पुरलासे अंत ॥ दत्त येऊनिया ऊभा ठाकला । भावे साष्टांगेसी प्रणिपात केला ॥ प्रसन्न होऊनि आशीर्वाद दिधला । जन्ममरणाचा फेरा चुकवीला ॥ दत्त दत्त ऐसें लागले ध्यान । हरपले मन झाले उन्मन ॥ मी तू पणाची झाली बोळवण । एका जनार्दनी श्रीदत्तध्यान ॥
लिप्यंतरण
Trigunatmak Traimurti Datta Ha Jana Triguni Avatar Trailokya Rana Neti Neti Shabda Na Ye Anumana Suravar Munijan Yogi Samadhi Na Ye Dhyana Jai Dev Jai Dev Jai Shri Gurudatta Arati Ovalita Harali Bhavachinta Sabahya Abhyantari Tu Ek Datta Abhagyasi Kaichi Kalel Hi Mat Parahi Paratali Tethe Kaicha Het Janmamaranachahi Puralase Ant Datta Yeuniya Ubha Thakala Bhave Sashtangesi Pranipat Kela Prasanna Houni Ashirvad Didhala Janmamaranacha Phera Chukavila Datta Datta Aisen Lagale Dhyan Harapale Man Jhale Unman Mi Tu Panachi Jhali Bolavan Eka Janardani Shridattadhyan
दत्तात्रेय और एकनाथ की आरती
ऋषि अत्रि और अनसूया के पुत्र दत्तात्रेय एक ही रूप में ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं, जिन्हें प्रायः तीन मुख और छह भुजाओं के साथ, गाय और चार श्वानों सहित दिखाया जाता है। वे सबसे बढ़कर आदि गुरु हैं, और महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में विशेष प्रिय हैं। मराठी की यह आरती सोलहवीं सदी के पैठण के संत एकनाथ ने रची, जिनके अपने गुरु जनार्दन स्वामी दत्त भक्त थे; एकनाथ इस पर "एका जनार्दनी", जनार्दन का एका, की छाप लगाते हैं।
आरती क्या कहती है
- एक में तीन: "त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा, त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्य राणा"। "नेति नेति" भी अनुमान से उन तक नहीं पहुँचता, और श्रेष्ठ देव, मुनि और योगी भी समाधि में उन्हें ध्यान में नहीं ला पाते।
- टेक: जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता, आरती ओवाळिता हरली भवचिंता, "आरती उतारते ही संसार की चिंता हर गई"।
- भीतर और बाहर: "सबाह्य अभ्यंतरी तू एक दत्त; अभाग्यासी कैची कळेल हि मात"। परा वाणी भी वहाँ से लौट आई, और जन्म-मरण का अंत हो गया।
- दत्त का आना: दत्त आकर सामने खड़े हुए; भाव से साष्टांग प्रणाम किया; प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया और जन्म-मरण का फेरा चुका दिया।
- लीन होना: "दत्त दत्त" ही ध्यान बन गया; मन हरपकर उन्मन, मन से परे, हो गया; "मैं-तू" की विदाई हो गई, कहते हैं एका जनार्दनी, श्री दत्त के ध्यान में।
कब गाएँ
- मराठी घरों की नित्य संध्या आरती में, प्रायः सुखकर्ता दुखहर्ता के बाद।
- दत्त जयंती, मार्गशीर्ष पूर्णिमा को, और दत्त के दिन गुरुवार को।
- गाणगापुर, नरसोबावाडी और औदुंबर जैसे दत्त मंदिरों में, और गुरुचरित्र पारायण के साथ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दत्त आरती "त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती" किसने लिखी?
पैठण के संत एकनाथ ने; अंतिम पंक्ति "एका जनार्दनी" उनकी छाप है, जिसमें उनके गुरु जनार्दन स्वामी का नाम है।
दत्त जयंती कब है?
मार्गशीर्ष पूर्णिमा को, प्रायः दिसंबर में।
"आरती ओवाळिता हरली भवचिंता" का क्या अर्थ है?
"आरती उतारते समय संसार की चिंता हर ली गई"। मराठी में ओवाळणे दीपक को गोलाकार घुमाना है।
दत्तात्रेय को त्रिमूर्ति क्यों कहते हैं?
वे ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सम्मिलित रूप हैं, जो वरदान के रूप में अत्रि और अनसूया के यहाँ जन्मे।
क्या मराठी न जानने वाले इसे गा सकते हैं?
हाँ। ऊपर का लिप्यंतरण मराठी उच्चारण के अनुसार है, और अर्थ वाला भाग हर पद समझाता है।
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