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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को श्रीकृष्ण का जन्म: मथुरा के कारागार और यमुना पार करने की कथा, व्रत और मध्यरात्रि पूजा, अक्सर दो तिथियाँ क्यों होती हैं, लड्डू गोपाल की सेवा, दही हांडी, और मथुरा, द्वारका, उडुपी व इस्कॉन में उत्सव।

यह कब पड़ती है

जन्माष्टमी उत्तर भारतीय पंचांग में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी है — पश्चिम और दक्षिण के अमान्त पंचांग में श्रावण कृष्ण अष्टमी। यह अगस्त या सितम्बर के आरम्भ में पड़ती है। श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि को हुआ, इसलिए मुख्य पूजा निशीथ काल — मध्यरात्रि — में होती है, और परम्परा रोहिणी नक्षत्र को भी देखती है, जिसमें उनका जन्म हुआ।

2026 और 2027 में जन्माष्टमी

नीचे की तिथियाँ नई दिल्ली के लिए स्मार्त जन्माष्टमी की हैं, द्रिक पंचांग से। मध्यरात्रि की पूजा इसी तारीख की रात होती है; वैष्णव मन्दिर अगला दिन मना सकते हैं (नीचे देखें)।

वर्षश्रीकृष्ण जन्माष्टमी
2026शुक्रवार, 4 सितम्बर
2027बुधवार, 25 अगस्त

श्रीकृष्ण का जन्म क्यों मनाया जाता है

वैष्णवों के लिए श्रीकृष्ण केवल विष्णु के आठवें अवतार नहीं, भगवान का पूर्णतम प्राकट्य हैं — भागवत के शब्दों में भगवान स्वयम्। भगवद्गीता में वे अर्जुन से कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, वे सज्जनों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए संसार में आते हैं (गीता 4.7–8)। जन्माष्टमी उसी आगमन का उत्सव है: भगवान का जन्म महल में नहीं, कारागार में, आधी रात को, बेड़ियों में बँधी माता से, और पालन ग्वालों के बीच। इसीलिए यह पर्व गहरी श्रद्धा और नवजात के प्रति उमड़ने वाले वात्सल्य, दोनों को मिलाता है।

अक्सर दो तिथियाँ क्यों होती हैं

अष्टमी और रोहिणी हमेशा एक साथ नहीं पड़तीं, और अलग-अलग समुदाय इन्हें अलग महत्त्व देते हैं। स्मार्त परिवार सामान्यतः वह रात मानते हैं जब मध्यरात्रि में अष्टमी हो। वैष्णव परम्पराएँ — मथुरा, वृन्दावन और इस्कॉन सहित — प्रायः सूर्योदय की अष्टमी या रोहिणी को अधिक महत्त्व देती हैं, और इसलिए एक दिन बाद मना सकती हैं। इसी कारण पंचांगों में जन्माष्टमी अक्सर लगातार दो दिनों पर दी होती है। अपने परिवार या मन्दिर की परम्परा मानें; अष्टमी और रोहिणी के समय के लिए पंचांग देखें।

जन्म की कथा

भागवत पुराण (दशम स्कन्ध) यह कथा कहता है। मथुरा के राजा कंस को चेतावनी मिली थी कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी, इसलिए उसने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में डालकर उनकी संतानों को एक-एक करके मार डाला। जब आठवीं संतान का जन्म मध्यरात्रि को कारागार में हुआ, तो पहरेदार सो गए, बेड़ियाँ खुल गईं और द्वार अपने आप खुल गए। वसुदेव नवजात को टोकरी में रखकर उफनती यमुना पार ले गए — नदी ने उन्हें मार्ग दिया और शेषनाग ने वर्षा से शिशु की रक्षा की — और गोकुल पहुँचकर उसे यशोदा और नन्द की तुरन्त जन्मी कन्या से बदल दिया। श्रीकृष्ण गोकुल और वृन्दावन में यशोदा के पुत्र के रूप में बड़े हुए, और बाद में मथुरा लौटकर कंस का अन्त किया।

कैसे मनाई जाती है

  1. व्रत: श्रद्धालु दिन भर व्रत रखते हैं — बहुत-से केवल फल और दूध लेते हैं, कुछ निर्जला व्रत रखते हैं — और मध्यरात्रि की पूजा के बाद व्रत खोलते हैं।
  2. झूला: बाल गोपाल की प्रतिमा सजे हुए झूले में रखी जाती है, और घरों व मन्दिरों में उनके जीवन के दृश्यों की झाँकियाँ सजाई जाती हैं।
  3. मध्यरात्रि अभिषेक: मध्यरात्रि को शंख बजता है, और बाल गोपाल को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से, फिर जल से स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और झूले में बैठाया जाता है। कृष्ण पूजा विधि देखें।
  4. भोग: माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, पंचामृत, फल और मिठाइयाँ अर्पित की जाती हैं, हर भोग पर तुलसी दल के साथ।
  5. आरती और कीर्तन: आरती कुंजबिहारी की, हरे कृष्ण महामंत्र, कृष्ण चालीसा और मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो जैसे भजन।

व्रत के बारे में: अस्वस्थ, गर्भवती, वृद्ध या दवा लेने वाले लोग हल्का फल-दूध का व्रत या केवल मध्यरात्रि की पूजा कर सकते हैं। बच्चों से सामान्यतः व्रत नहीं रखवाया जाता; मध्यरात्रि को झूला झुलाने वाले प्रायः वही होते हैं।

लड्डू गोपाल: परिवार के सदस्य के रूप में श्रीकृष्ण

बहुत से घरों में हाथ में लड्डू लिए घुटनों के बल चलते बालकृष्ण की पीतल की छोटी प्रतिमा, लड्डू गोपाल या बाल गोपाल, रखी जाती है, और वर्ष भर घर के बच्चे की तरह उनकी सेवा होती है: उन्हें जगाया, नहलाया, सजाया, भोजन के समय भोग लगाया और रात को सुलाया जाता है। जन्माष्टमी उनका जन्मदिन है, इसलिए परिवार उन्हें नई पोशाक, नया झूला या बाँसुरी और विशेष भोग देते हैं। यदि आप पहली बार लड्डू गोपाल घर ला रहे हैं, तो जन्माष्टमी आरम्भ का पारम्परिक दिन है; दैनिक सेवा सुबह जल, तुलसी और कुछ मीठे के भोग और सन्ध्या के दीपक जितनी सरल हो सकती है।

दही हांडी और नन्दोत्सव

जन्माष्टमी का अगला दिन नन्दोत्सव है — पुत्र-जन्म पर नन्द के घर का उत्सव, मिठाइयों और उपहारों के साथ। महाराष्ट्र में यह गोपालकाला या दही हांडी है: युवकों की टोलियाँ, जिन्हें गोविन्दा कहते हैं, मानव-पिरामिड बनाकर सड़क के ऊपर ऊँचाई पर टँगी दही की मटकी फोड़ती हैं — गोकुल में बालकृष्ण की माखन-चोरी का पुनर्मंचन। ऊँचे पिरामिड ख़तरनाक होते हैं, इसलिए महाराष्ट्र ने दही हांडी के लिए सुरक्षा नियम बनाए हैं, जिनमें न्यूनतम आयु, सुरक्षा बेल्ट, हेलमेट और गद्दे शामिल हैं; आयोजकों से इनके पालन की अपेक्षा है।

भारत भर में जन्माष्टमी

  • मथुरा और वृन्दावन: पर्व के केन्द्र। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि मन्दिर में मध्यरात्रि का अभिषेक मुख्य है; वृन्दावन के बाँके बिहारी मन्दिर में वर्ष में केवल एक बार होने वाली मंगला आरती जन्माष्टमी की रात होती है। सप्ताह भर ब्रज में रासलीला मण्डलियाँ प्रस्तुति देती हैं।
  • गुजरात, द्वारका: द्वारका के राजा श्रीकृष्ण के द्वारकाधीश मन्दिर को सजाया जाता है, और रात संगीत और गरबे के साथ मनाई जाती है।
  • कर्नाटक, उडुपी: कृष्ण मठ में कृष्ण जयंती और उसके बाद विट्ल पिण्डी उत्सव, अपनी परम्पराओं के साथ, जैसे सड़क पर ग्वालों के खेल।
  • तमिलनाडु और केरल: गोकुलाष्टमी या श्री जयंती के रूप में, द्वार से पूजाघर तक चावल के आटे से नन्हे पदचिह्न बनाए जाते हैं, मानो बालकृष्ण स्वयं भीतर आए हों, और सीडै, मुरुक्कु और अप्पम अर्पित होते हैं।
  • ओडिशा और जगन्नाथ पुरी: जन्माष्टमी के बाद मन्दिर के अपने पंचांग का नन्द उत्सव होता है।
  • विश्व भर के इस्कॉन मन्दिर: पूरे दिन कीर्तन, भागवत के दशम स्कन्ध का पाठ, मध्यरात्रि अभिषेक, और अगले दिन भोज, जो उनके संस्थापक ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद का आविर्भाव दिवस भी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

2027 में जन्माष्टमी कब है?

नई दिल्ली में स्मार्त जन्माष्टमी बुधवार, 25 अगस्त 2027 को है; वैष्णव मन्दिर अगले दिन मना सकते हैं। 2026 में यह 4 सितम्बर को थी।

जन्माष्टमी मध्यरात्रि को क्यों मनाई जाती है?

क्योंकि श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में कंस के कारागार में मध्यरात्रि को हुआ था। मुख्य पूजा और व्रत खोलना उसी समय के अनुसार होते हैं।

कुछ वर्षों में जन्माष्टमी की दो तिथियाँ क्यों होती हैं?

क्योंकि अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र हमेशा साथ नहीं पड़ते। स्मार्त परिवार सामान्यतः पहली रात मनाते हैं; मथुरा-वृन्दावन और इस्कॉन सहित वैष्णव परम्पराएँ प्रायः अगले दिन।

जन्माष्टमी का व्रत कैसे खोलें?

मध्यरात्रि की पूजा और आरती के बाद प्रसाद — पंचामृत, माखन-मिश्री या पंजीरी — लेकर। कुछ लोग अगली सुबह सूर्योदय के बाद व्रत खोलते हैं।

जन्माष्टमी पर बाल गोपाल को क्या भोग लगाएँ?

माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, पंचामृत, फल और मिठाइयाँ, हमेशा तुलसी दल के साथ।

दही हांडी क्या है?

मुख्यतः महाराष्ट्र की परम्परा, जिसमें मानव-पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर टँगी दही की मटकी फोड़ी जाती है — बालकृष्ण की माखन-चोरी का पुनर्मंचन। यह जन्माष्टमी के अगले दिन होती है।

श्रीकृष्ण के माता-पिता कौन थे?

उनके जन्मदाता माता-पिता देवकी और वसुदेव थे; गोकुल में उनका पालन यशोदा और नन्द ने किया।

जन्माष्टमी पर नन्हे पदचिह्न क्यों बनाते हैं?

मुख्यतः दक्षिण भारत में, मुख्य द्वार से पूजाघर तक चावल के आटे के नन्हे पदचिह्न बनाए जाते हैं, घर में आते बालकृष्ण के स्वागत के रूप में।

गोकुलाष्टमी क्या है?

जन्माष्टमी का ही दूसरा नाम, विशेषकर महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में, गोकुल के नाम पर जहाँ श्रीकृष्ण पले।

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