Bhakti Arohan
ॐ

संतोषी माता चालीसा

संतोष की देवी संतोषी माता की चालीसा, जो शुक्रवार व्रत के साथ पढ़ी जाती है। यह उन्हें गणेश की पुत्री कहती है, फिर विंध्याचल और ज्वालाजी से लेकर मदुरै, मुंबई और पावागढ़ तक भारत के दर्जन भर शक्तिस्थलों की देवी के रूप में उनका नाम लेती है, और अंत में गुड़-चने के भोग और व्रत के फल बताती है।

संतोषी माता चालीसा

मूल पाठ

॥ दोहा ॥ बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार । ध्यान धरत ही होत नर दुःख सागर से पार ॥ भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम । कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम ॥ ॥ चौपाई ॥ जय सन्तोषी मात अनूपम । शान्ति दायिनी रूप मनोरम ॥1॥ सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा । वेश मनोहर ललित अनुपा ॥2॥ श्वेताम्बर रूप मनहारी । माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी ॥3॥ दिव्य स्वरूपा आयत लोचन । दर्शन से हो संकट मोचन ॥4॥ जय गणेश की सुता भवानी । रिद्धि- सिद्धि की पुत्री ज्ञानी ॥5॥ अगम अगोचर तुम्हरी माया । सब पर करो कृपा की छाया ॥6॥ नाम अनेक तुम्हारे माता । अखिल विश्व है तुमको ध्याता ॥7॥ तुमने रूप अनेकों धारे । को कहि सके चरित्र तुम्हारे ॥8॥ धाम अनेक कहाँ तक कहिये । सुमिरन तब करके सुख लहिये ॥9॥ विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी । कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी ॥10॥ कलकत्ते में तू ही काली । दुष्ट नाशिनी महाकराली ॥11॥ सम्बल पुर बहुचरा कहाती । भक्तजनों का दुःख मिटाती ॥12॥ ज्वाला जी में ज्वाला देवी । पूजत नित्य भक्त जन सेवी ॥13॥ नगर बम्बई की महारानी । महा लक्ष्मी तुम कल्याणी ॥14॥ मदुरा में मीनाक्षी तुम हो । सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो ॥15॥ राजनगर में तुम जगदम्बे । बनी भद्रकाली तुम अम्बे ॥16॥ पावागढ़ में दुर्गा माता । अखिल विश्व तेरा यश गाता ॥17॥ काशी पुराधीश्वरी माता । अन्नपूर्णा नाम सुहाता ॥18॥ सर्वानन्द करो कल्याणी । तुम्हीं शारदा अमृत वाणी ॥19॥ तुम्हरी महिमा जल में थल में । दुःख दारिद्र सब मेटो पल में ॥20॥ जेते ऋषि और मुनीशा । नारद देव और देवेशा ॥21॥ इस जगती के नर और नारी । ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी ॥22॥ जापर कृपा तुम्हारी होती । वह पाता भक्ति का मोती ॥23॥ दुःख दारिद्र संकट मिट जाता । ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता ॥24॥ जो जन तुम्हरी महिमा गावै । ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै ॥25॥ जो मन राखे शुद्ध भावना । ताकी पूरण करो कामना ॥26॥ कुमति निवारि सुमति की दात्री । जयति जयति माता जगधात्री ॥27॥ शुक्रवार का दिवस सुहावन । जो व्रत करे तुम्हारा पावन ॥28॥ गुड़ छोले का भोग लगावै । कथा तुम्हारी सुने सुनावै ॥29॥ विधिवत पूजा करे तुम्हारी । फिर प्रसाद पावे शुभकारी ॥30॥ शक्ति-सामरथ हो जो धनको । दान-दक्षिणा दे विप्रन को ॥31॥ वे जगती के नर औ नारी । मनवांछित फल पावें भारी ॥32॥ जो जन शरण तुम्हारी जावे । सो निश्चय भव से तर जावे ॥33॥ तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे । निश्चय मनवांछित वर पावै ॥34॥ सधवा पूजा करे तुम्हारी । अमर सुहागिन हो वह नारी ॥35॥ विधवा धर के ध्यान तुम्हारा । भवसागर से उतरे पारा ॥36॥ जयति जयति जय संकट हरणी । विघ्न विनाशन मंगल करनी ॥37॥ हम पर संकट है अति भारी । वेगि खबर लो मात हमारी ॥38॥ निशिदिन ध्यान तुम्हारो ध्याता । देह भक्ति वर हम को माता ॥39॥ यह चालीसा जो नित गावे । सो भवसागर से तर जावे ॥40॥ ॥ दोहा ॥ संतोषी माँ के सदा बंदहूँ पग निश वास । पूर्ण मनोरथ हो सकल मात हरौ भव त्रास ॥ ॥ इति श्री संतोषी माता चालीसा ॥

लिप्यंतरण

Doha: Bandaun Santoshi Charan Riddhi-Siddhi Datar. Dhyan Dharat Hi Hot Nar Dukh Sagar Se Paar. Bhaktan Ko Santosh De Santoshi Tav Naam. Kripa Karahu Jagdamb Ab Aaya Tere Dhaam. Chaupai: 1. Jai Santoshi Maat Anupam, Shanti Dayini Roop Manoram. 2. Sundar Varan Chaturbhuj Roopa, Vesh Manohar Lalit Anupa. 3. Shwetambar Roop Manhari, Maa Tumhari Chhavi Jag Se Nyari. 4. Divya Swaroopa Aayat Lochan, Darshan Se Ho Sankat Mochan. 5. Jai Ganesh Ki Suta Bhavani, Riddhi-Siddhi Ki Putri Gyani. 6. Agam Agochar Tumhari Maya, Sab Par Karo Kripa Ki Chhaya. 7. Naam Anek Tumhare Mata, Akhil Vishwa Hai Tumko Dhyata. 8. Tumne Roop Anekon Dhare, Ko Kahi Sake Charitra Tumhare. 9. Dhaam Anek Kahan Tak Kahiye, Sumiran Tab Karke Sukh Lahiye. 10. Vindhyachal Mein Vindhyavasini, Koteshwar Saraswati Suhasini. 11. Kalkatte Mein Tu Hi Kali, Dusht Nashini Mahakarali. 12. Sambal Pur Bahuchara Kahati, Bhaktjanon Ka Dukh Mitati. 13. Jwala Ji Mein Jwala Devi, Poojat Nitya Bhakt Jan Sevi. 14. Nagar Bambai Ki Maharani, Maha Lakshmi Tum Kalyani. 15. Madura Mein Meenakshi Tum Ho, Sukh Dukh Sabki Sakshi Tum Ho. 16. Rajnagar Mein Tum Jagdambe, Bani Bhadrakali Tum Ambe. 17. Pavagadh Mein Durga Mata, Akhil Vishwa Tera Yash Gata. 18. Kashi Puradhishwari Mata, Annapurna Naam Suhata. 19. Sarvanand Karo Kalyani, Tumhin Sharada Amrit Vani. 20. Tumhari Mahima Jal Mein Thal Mein, Dukh Daridra Sab Meto Pal Mein. 21. Jete Rishi Aur Munisha, Narad Dev Aur Devesha. 22. Is Jagati Ke Nar Aur Nari, Dhyan Dharat Hain Maat Tumhari. 23. Japar Kripa Tumhari Hoti, Vah Pata Bhakti Ka Moti. 24. Dukh Daridra Sankat Mit Jata, Dhyan Tumhara Jo Jan Dhyata. 25. Jo Jan Tumhari Mahima Gavai, Dhyan Tumhara Kar Sukh Pavai. 26. Jo Man Rakhe Shuddh Bhavana, Taki Puran Karo Kamana. 27. Kumati Nivari Sumati Ki Datri, Jayati Jayati Mata Jagdhatri. 28. Shukravar Ka Divas Suhavan, Jo Vrat Kare Tumhara Pavan. 29. Gud Chhole Ka Bhog Lagavai, Katha Tumhari Sune Sunavai. 30. Vidhivat Pooja Kare Tumhari, Phir Prasad Pave Shubhkari. 31. Shakti-Samarath Ho Jo Dhanko, Daan-Dakshina De Vipran Ko. 32. Ve Jagati Ke Nar Au Nari, Manvanchhit Phal Paven Bhari. 33. Jo Jan Sharan Tumhari Jave, So Nishchay Bhav Se Tar Jave. 34. Tumharo Dhyan Kumari Dhyave, Nishchay Manvanchhit Var Pavai. 35. Sadhava Pooja Kare Tumhari, Amar Suhagin Ho Vah Nari. 36. Vidhava Dhar Ke Dhyan Tumhara, Bhavsagar Se Utare Para. 37. Jayati Jayati Jai Sankat Harani, Vighna Vinashan Mangal Karani. 38. Ham Par Sankat Hai Ati Bhari, Vegi Khabar Lo Maat Hamari. 39. Nishidin Dhyan Tumharo Dhyata, Deh Bhakti Var Ham Ko Mata. 40. Yah Chalisa Jo Nit Gave, So Bhavsagar Se Tar Jave. Doha: Santoshi Maa Ke Sada Bandahun Pag Nish Vaas. Poorn Manorath Ho Sakal Maat Harau Bhav Traas.

संतोष की देवी

संतोषी माता सचमुच एक नई देवी हैं। उनकी पूजा बीसवीं सदी में उत्तर और पश्चिम भारत में फैली, और 1975 की फ़िल्म जय संतोषी माँ के बाद बहुत तेज़ी से बढ़ी। चालीसा उन्हें वही परिवार देती है जो परंपरा देती है: वे गणेश की सुता हैं, रिद्धि-सिद्धि की पुत्री (चौपाई 5)। उनका नाम ही उनका वचन है। पहला दोहा कहता है कि वे भक्तों को संतोष देती हैं, और राहत से बड़ा कुछ नहीं माँगता: "हे जगदम्ब, कृपा करो, मैं तुम्हारे धाम आया हूँ।"

आरंभिक चौपाइयों में उनका रूप शांत है, उग्र नहीं। वे चतुर्भुजा हैं, सुंदर हैं, श्वेत वस्त्र पहनती हैं, नयन बड़े हैं, और उनके दर्शन से संकट दूर होते हैं।

एक देवी, अनेक धाम

इस चालीसा का सबसे अनोखा भाग चौपाई 9 से 18 है। कोई पौराणिक कथा कहने के बजाय यह एक तीर्थयात्रा करवाती है और कहती है कि हर धाम की देवी स्वयं संतोषी माता हैं:

  • विंध्याचल में विंध्यवासिनी
  • कोटेश्वर में सरस्वती
  • कलकत्ते में काली
  • चालीसा के शब्दों में "सम्बल पुर" में बहुचरा
  • ज्वालाजी में ज्वाला देवी
  • "नगर बंबई की महारानी" महालक्ष्मी
  • मदुरै में मीनाक्षी
  • राजनगर (अहमदाबाद का पुराना नाम) में भद्रकाली
  • पावागढ़ में दुर्गा
  • काशी की अधीश्वरी अन्नपूर्णा

किसी नई देवी को पुरानी परंपरा में स्थान ऐसे ही मिलता है: यह दिखाकर कि वे वही देवी हैं जिन्हें लोग पहले से जानते हैं। चौपाई 19 शारदा (सरस्वती) को भी जोड़ देती है, और यह भाग इस बात पर समाप्त होता है कि उनकी महिमा जल और थल दोनों में व्याप्त है।

चालीसा में शुक्रवार व्रत

चौपाई 28 से 32 कुछ पंक्तियों में शुक्रवार के व्रत का वर्णन करती हैं। शुक्रवार उनका सुहावना दिन है। जो उनका पावन व्रत रखे, वह गुड़-चने का भोग लगाए, उनकी कथा सुने या सुनाए, विधिवत पूजा करे और फिर प्रसाद ले। जिसके पास सामर्थ्य हो, वह ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दे। चालीसा व्रत के सबसे प्रसिद्ध नियम का उल्लेख नहीं करती, कि उस दिन कुछ भी खट्टा न खाया जाए न परोसा जाए, पर व्रत रखने वाले घर इसका सख़्ती से पालन करते हैं। कई लोग सोलह शुक्रवार पूरे करके उद्यापन करते हैं, जिसमें आठ बालकों को बिना खटाई का भोजन कराया जाता है।

हर परिस्थिति के लिए आशीर्वाद

चौपाई 33 से 36 अलग-अलग भक्तों को बारी-बारी संबोधित करती हैं, और यही एक कारण है कि यह चालीसा घरों में इतनी पढ़ी जाती है। उनका ध्यान करने वाली कुमारी मनचाहा वर पाती है (34)। उनकी पूजा करने वाली सधवा अमर सुहागिन रहती है (35)। उनका ध्यान करने वाली विधवा भवसागर से पार उतरती है (36)। अंतिम चौपाइयाँ व्यक्तिगत और आतुर हो जाती हैं: "हम पर संकट अति भारी है, माँ, जल्दी हमारी सुध लो।"

पाठ कैसे होता है

यह चालीसा आमतौर पर शुक्रवार सुबह व्रत के अंग के रूप में, संतोषी माता की कथा और "जय संतोषी माता" आरती के साथ पढ़ी जाती है। उनके चित्र के सामने गुड़ और भुने चने की छोटी कटोरी रखी जाती है। कुछ लोग किसी कठिन दौर में इसे रोज़ पढ़ते हैं, व्रत की संतोष वाली भावना के साथ: पर्याप्त माँगना, अधिक नहीं। अंतिम दोहा "निशि-वासर" उनके चरणों में प्रणाम करता है और विनती करता है कि सब मनोरथ पूरे हों और संसार का भय दूर हो।

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