रसोई में होने वाली पूजा
अन्नपूर्णा की पूजा वहीं होती है जहाँ भोजन बनता है। उनकी मूर्ति, यदि आपके पास है, रसोई में या उसके पास होनी चाहिए, और उनकी पूजा का सबसे सरल रूप अलग पूजाघर के बिना भी रोज़ होता है: किसी के खाने से पहले पके भोजन का पहला भाग उन्हें अर्पित किया जाता है। नीचे दी गई विस्तृत पूजा विशेष दिनों के लिए है। उनके बारे में अधिक माँ अन्नपूर्णा पृष्ठ पर पढ़ें।
कब करें
- हर दिन: पहले भोजन से पहले रसोई में छोटा अर्पण।
- अन्नपूर्णा जयंती: मार्गशीर्ष पूर्णिमा।
- बंगाल में अन्नपूर्णा पूजा: चैत्र शुक्ल अष्टमी।
- नए घर में प्रवेश, नई रसोई बनाना, या नई फसल के अनाज से पहली बार भोजन बनाना।
- नियमित साधना करने वालों के लिए शुक्रवार और पूर्णिमा।
रोज़ का अर्पण
- भोजन बनाने के बाद, किसी के खाने से पहले, चावल या रोटी और जो भी बना हो उसका थोड़ा भाग साफ़ थाली या पत्ते पर अलग रखें।
- उसे उनकी मूर्ति के सामने, या केवल चूल्हे के पास रखें, और अन्नपूर्णे सदापूर्णे श्लोक एक बार कहें।
- बाद में वह भाग गाय, पक्षी, कुत्ते या किसी ज़रूरतमंद को दें, या प्रसाद के रूप में परिवार के भोजन में मिला दें।
विस्तृत पूजा: सामग्री
- अन्नपूर्णा की मूर्ति (परंपरा से पीतल की, करछी और कटोरा लिए), या चित्र।
- रसोई में छोटी चौकी पर साफ़ लाल या पीला कपड़ा।
- घी का दीपक, धूप, रोली, हल्दी, अक्षत, लाल फूल।
- कच्चे चावल का कटोरा और नई करछी या चम्मच।
- उसी दिन ताज़ी बनी खीर या कोई मीठा व्यंजन, और फल।
- जल से भरा कलश।
क्रमवार विधि
- रसोई को अच्छी तरह साफ़ करें, चूल्हा और अनाज का भंडार भी। यह पूजा का ही हिस्सा है, उसकी तैयारी भर नहीं।
- चौकी सजाएँ और कपड़े पर उनकी मूर्ति रखें, सामने चावल का कटोरा और करछी।
- संकल्प। जल, अक्षत और फूल लेकर अपना नाम और उद्देश्य कहें (जैसे, "हमारे घर में कभी अन्न की कमी न हो और हम जो है उसे बाँटें"), और छोड़ दें।
- फूल और अक्षत से गणेश जी का स्मरण करें।
- अन्नपूर्णा की पूजा। जल, रोली-हल्दी का तिलक, अक्षत, लाल फूल और धूप अर्पित करें। दीपक जलाएँ।
- मंत्र। अन्नपूर्णे सदापूर्णे 11 या 108 बार पढ़ें।
- स्तोत्र और चालीसा। अन्नपूर्णा स्तोत्रम् या अन्नपूर्णा चालीसा, या दोनों पढ़ें।
- भोग। खीर और फल अर्पित करें।
- आरती। बारम्बार प्रणाम गाएँ।
- किसी को भोजन कराएँ। परिवार के खाने से पहले किसी अतिथि, पड़ोसी, घर में काम करने वाले, या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ। यही चरण अन्नपूर्णा पूजा को पूर्ण करता है।
ध्यान रखने योग्य बातें
- उनके दिन, और हो सके तो किसी भी दिन, भोजन व्यर्थ न करें। पका भोजन फेंकना ही वह एक बात है जिससे उनकी पूजा बचने को कहती है।
- अनाज का भंडार साफ़ रखें और कभी पूरी तरह खाली न छोड़ें; बहुत-से परिवार अन्नपूर्णा जयंती पर उसमें मुट्ठी भर नया अनाज डालते हैं।
- पूजा के चावल प्रसाद के रूप में पकाकर खाए जा सकते हैं, या साल भर अनाज के भंडार में रखे जा सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अन्नपूर्णा की मूर्ति कहाँ रखें?
परंपरा से रसोई में या उसके पास, किसी साफ़, ऊँचे स्थान पर। यदि यह संभव न हो, तो पूजाघर में रखें और वहीं भोजन अर्पित करें।
अन्नपूर्णा जयंती कब होती है?
मार्गशीर्ष पूर्णिमा को, जो प्रायः दिसंबर में पड़ती है। बंगाल में अन्नपूर्णा पूजा चैत्र शुक्ल अष्टमी को होती है।
अन्नपूर्णा को कौन-सा भोग प्रिय है?
चावल और खीर परंपरागत हैं, क्योंकि उनकी मूर्ति चावल का पात्र लिए होती है। कोई भी ताज़ा, सात्त्विक घर का बना भोजन स्वीकार्य है।
क्या अन्नपूर्णा पूजा रोज़ कर सकते हैं?
हाँ, और रोज़ का छोटा अर्पण ही इसका सबसे महत्वपूर्ण रूप है। विस्तृत पूजा विशेष दिनों के लिए है।
अन्नपूर्णा के लिए कौन-सा मंत्र पढ़ा जाता है?
"अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे, ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति", अन्नपूर्णा स्तोत्रम् से।
किसी को भोजन कराना पूजा का हिस्सा क्यों है?
क्योंकि वे संसार को भोजन देने वाली देवी हैं। भोजन बाँटना ही उनके आशीर्वाद को आगे बढ़ाना है, और परंपरा किसी को भोजन कराए बिना अन्नपूर्णा पूजा को अधूरी मानती है।
क्या अन्नपूर्णा पार्वती का रूप हैं या दुर्गा का?
वे शिव जी की अर्धांगिनी पार्वती हैं, अन्नदात्री रूप में। चूँकि पार्वती की दुर्गा रूप में भी पूजा होती है, दुर्गा चालीसा भी उनके रूपों में अन्नपूर्णा का नाम लेती है।
कोई त्रुटि दिखे?
यदि आपको इस पृष्ठ पर व्याकरण, हिंदी, अंग्रेज़ी, मंत्र-पाठ या किसी भी प्रकार की त्रुटि दिखे, तो हमें बताएँ — हम 24 घंटे में उसे ठीक कर देंगे।
