Bhakti Arohan
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सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी

Sampurnanand Sanskrit Vishwavidyalaya, Varanasi

सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
स्थापना
1791
प्रकार
विश्वविद्यालय
स्थान
Varanasi, Uttar Pradesh

परिचय

भारत में संस्कृत अध्ययन के सबसे पुराने केंद्रों में से एक। इसकी जड़ें 1791 में स्थापित गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज, बनारस में हैं, और 1956 के वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम से यह विश्वविद्यालय बना। यहाँ वेद-वेदांग, साहित्य-संस्कृति, दर्शन और श्रमण विद्या संकायों के माध्यम से शास्त्री और आचार्य पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं, और उत्तर प्रदेश के अनेक संस्कृत महाविद्यालय इससे सम्बद्ध हैं।

पाठ्यक्रम एवं अध्ययन क्षेत्र

  • शास्त्री (स्नातक)
  • आचार्य (स्नातकोत्तर)
  • पीएच.डी.
  • वेद-वेदांग संकाय: वेद, धर्मशास्त्र, ज्योतिष (सिद्धान्त, फलित, गणित), व्याकरण
  • साहित्य-संस्कृति संकाय: साहित्य, पुराणेतिहास
  • दर्शन संकाय: न्याय-वैशेषिक, वेदान्त, मीमांसा, सांख्य-योग-तन्त्रागम
  • श्रमण विद्या संकाय: बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन, प्राकृत एवं जैनागम, पालि एवं थेरवाद
  • आधुनिक ज्ञान-विज्ञान संकाय: आधुनिक भाषाएँ, सामाजिक विज्ञान, शिक्षा आदि

इतिहास

गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज (1791)

विश्वविद्यालय के अपने विवरण के अनुसार इसका आरंभ 1791 में हुआ, जब ईस्ट इंडिया कंपनी के तत्कालीन रेज़िडेंट जोनाथन डंकन के प्रस्ताव और गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस की स्वीकृति से गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज, बनारस की स्थापना हुई। पं. काशीनाथ इसके प्रथम अध्यापक और आचार्य थे। आरंभ से ही यहाँ वेद, वेदान्त, पुराण, आयुर्वेद, साहित्य, ज्योतिष, मीमांसा और न्याय पढ़ाए जाते थे।

विद्वान प्राचार्य और पांडुलिपि पुस्तकालय

1844 में जे. म्योर कॉलेज के पहले प्राचार्य बने। संस्कृत पांडुलिपियों के संग्रह, संरक्षण और प्रकाशन के प्रयासों से "सरस्वती भवन" पुस्तकालय बना। डॉ. गंगानाथ झा (प्राचार्य 1918–1923) के समय "सरस्वती भवन ग्रन्थमाला" और "सरस्वती भवन स्टडीज़" का प्रकाशन आरंभ हुआ, और महामहोपाध्याय पं. गोपीनाथ कविराज (1923–1937) ने ग्रंथों के अनुवाद, प्रकाशन और पांडुलिपियों की सूची-निर्माण का कार्य आगे बढ़ाया।

विश्वविद्यालय का रूप (1956)

कॉलेज को विश्वविद्यालय बनाने के प्रयास 1904 और फिर 1937 में हुए, पर यह 1956 में वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम से ही संभव हुआ। उससे पहले भी कॉलेज एक विश्वविद्यालय की तरह कार्य करता था — 1947 से 1958 तक यहाँ दीक्षांत समारोह होते रहे, और भारत व नेपाल के संस्कृत महाविद्यालय इससे सम्बद्ध थे; केवल उत्तर प्रदेश में ही 1,441। कॉलेज के अंतिम प्राचार्य पं. कुबेरनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय के पहले कुलसचिव बने।